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मंगलवार, 12 सितंबर 2017

बाबा रामसापीर व डालीबाई की समाधि गाथा

बाबा रामसापीर व डालीबाई की समाधि गाथा


अमर होया जुग माय , सति सिद्ध गावं रुणिचै री पाल ।
धिन हो रामापीर , जियो जुग डालीबाई जयपाल ।।टेर।।
नित रा नेम डालीबाई वन मे , उभा टोगङियो लार ।
ज्यानै चारता आप साम्भलै , झालर री झणकार (1)
झालर ढोल नगारा सुणता , किन्हो सुगन विचार ।
के' कोई जानं चढै हद भारी , के' कोई जावे वार (2)
उणी ठोङ कोई ग्वालो दीसै , पूछै हैलो मार ।
ऐ ढोल कठीनै बाजै बीरा , कैवो नी समचार (3)
ग्वालो कैवै सुण बाई डाली , रुठ्यो पालणहार ।
आज रुणीचै रो राजवी , छोङ रैया सॅसार (4)
रामापीर री घोर खुदे है , रामसरोवरं पाल ।
इण विध विरह वियोग रा , ऐ गुन्ज रैया सुरताल (5)
इतरो सुण बाई डाली बोली , सुण गायो रा ग्वाल ।
म्हारा टोगङा थनै भलाऊ , रैईजै थू रखवाल (6)
ग्वालो कैवै ना बाई डाली , हू ऐकलो ग्वाल ।
गायो भैला टोगङिया , मै कंईया लैऊ सॅभाल (7)
डाली बोली जा रै बीरा , आछो कियो अहसाण ।
जै थू आज कैयो कर लैतो , तो करता सॅत बखाण(8)
टोगङियो रै हाथ फैर बाई , आसुङा ढलकायं ।
सोरा रैईजो गऊ रा जायो , फैर मिलुला नाय (9)
रैईजो अलख भरोसै वन मे , रैईजो सॅघ पिछाण ।
सांझ पङिया घर जावजो , नी रामापीर री आण (10)
इतरो कह बाई डाली जावै , रामसरोवरं पाल ।
जाय कैयो सुण वीर रामदै , ऐकर सामी भाल (11)
हरदम भैला भजन किया , कैई कीन्हा वचन विहार ।
आज डाली नै भूल परा , क्यो जावो हो भव पार (12)
सदा साथ मे जम्मा जगाया , पाठ धरम रा पूर ।
जमलै मे मिल बीणा बजाता , घुरता अनहदं तूर (13)
भैला रहता हैत हरख सू , अब क्यो जाओ दूर ।
थाॅ बिन म्हारी भगति सारी , होसी चकनाचूरं (14)
कहै रामदै सुण बाई डाली , ना मै थासू दूर ।
थाॅ बिन म्हारै नही उगता , हिरदै ग्यान अॅकूर (15)
निर्मल निरभै निकलॅक थारो , अदभुत है ओ नूर ।
अमर थारो नाम रैवैला , जब लग चन्दा सूर (16)
डाली कैवै ना ओ बीरा , म्हानै ना बिलमाय ।
था बिछङिया प्राण जावैला , घङी पलकं रै माय (17)
घोर खुदै सो म्हारी बीरा , थारी अवर खिणायं ।
जिवत समाधि लैसू इणमे , दैवो दया बगसाय (18)
आ काई बात करै बाई डाली , कैयो रामदै आप ।
म्हारै नाम री घोर खुदै , तू क्यो करै धणियाप (19)
भोली बाता मत कर बाई , दै वचना री छाप ।
बोलं वचन जै हार गयी तो , कलॅक लगै अणमाप (20)
भोली बाता नही कहू मै , भैदं कहू प्रमाणी ।
रति फरक ना आवै इणमे , ओलख जो सैनाणी (21)
पाटपिताम्बर खङाऊ शॅखझालर ,जै निकलै सैलाणी ।
तो लीजो आप समाधि उणमे , पारख सैगं सैनाणि(22)
आठी डोरा काॅगसी , जै निकलै प्रमाण ।
वोही समाधि म्हारी होवे , करल्यो खोदं पिछाण (23)
खोद्या खबर पङेला बीरा , होवेला ओलखाण ।
वचन भाख सिद्ध किया पलक मे , प्रगटिया प्रमाण(24)
आठी डोरा कागंसी , निकलिया सैलाण ।
परगट परचो देख रामसा - पीर अचम्भो आण (25)
रुणीचै रा नगर निवासी , उभा करै बखाण ।
धिन हो डाली बाई भला थे , परखाया प्रमाण (26)
रामापीर कैयो बाई डाली , धिन हो बारम्बार ।
थारी भगति रो बल भारी , तू सांची सचियार (27)
थारी माया काया रो , कोई पावेला नही पार ।
आज म्हानै खबर पङी , तू महा सति अवतार (28)
मां मंगनीदै आय डाली ने , हिवङै सू लिपटाय ।
पिता सायर जी आय धिया ने , चूनङली ओढायं (29)
बालपणै री सखियो सारी , झुरै झुरावो गाय ।
डालीबाई ने सीख दिरावै , ज्यू सासरै जाय (30)
मात पिता सू होय विदा बाई , बोलिया पैगाम ।
रिलमिल रीजो सगला जग मे , चोखा करजो काम (31)
भैदभाव कर मानवता ने , मत करजो बदनाम ।
हिन्दू - तुरक एक ही जाणो , एक ही अल्ला राम (32)
इतरो कह बाई डाली जावै , भोम समाधि माय ।
आसण धार अडिग हो बैठी , सुन्न मे सुरत समाय(33)
रामापीर जी दैवै समाधि , डाली भोम समाय ।
डाली रा जयकार गुॅजिया , दशु दिशा रै माय (34)
समाधि रा दर्शण सारु , भीङ लगी हद भारी ।
बाबो रामदै नैजा रोपिया , कर जुमलै री त्यारी (35)
बङा बङा कैई पीर पधारिया , ओर आया सिद्ध भारी ।
झालर शॅख नगाङा बाज्या , बाजी नोपत प्यारी (36)
धूप करण री वैला हुई , धूपो री महकारी ।
डालीबाई री होवे आरती , समाधि सिणगारी (37)
मुॅजो जी रिख पाठ पुरियो , बाबे थरपी झारी ।
रिखिया उभा चॅवर ढोलावे , डाली ने बलिहारी (38)
बाबा रामदे बीणो बजायो , छेङिया सुरताल ।
सभा जुङी हद भारी जमलै , मैलो भयो अपार (39)
ऐङो जम्मो होयो ना होसी , जग मे दूजी बार ।
चौबीस वाणी गायी रामदे , निज अणभै आधार (40)
वाणी बैखरी पार हुई जद , खोल्या मध्यमा द्वार ।
मध्यमा सू आय पश्यन्ति , किन्हो आप निहार (41)
परा वाणी मे आय पहूचिया , हद बैहद सू पार ।
इण विध जमलो आप जगायो , श्रीमुख वाणी सार(42)
वाणी वारता करी प्रेमं सू , बाबो सारी रात ।
घट घट माही किन्हो चान्दणो , मॅगल हुओ प्रभात (43)
प्रभातै री महा आरती , गायी सगला साथ ।
डालीबाई ने निवण करै , जोङ्या सगला हाथ (44)
साल बयालिस चवदासो री , सॅवत है प्रमाण ।
मासं भादवा नवमी सुद , डाली रो निर्वाण (45)
धिन हो डालीबाई - रामसा , पीर री अगवाण ।
मेघवॅशी रिख रामचन्द्र , कीन्ही कथा बखाण (46)
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( बाबे री समाधि )
भाग भला धिन गावं रुणिचै , रामसरोवरं पाल रा ।
लैवै समाधि रामदेव , सुत्त सायर जी जयपाल रा (टेर)


दशम री प्रभात रामदे , रिखियो ने फरमाय ।
घोर हमारी खोदो भायो , दैर लगाओ नाय ( 47)
डाली कारण एक दिवस रो , पायो मै विश्राम ।
आज म्हारा मान लिजो , थे आखरी सलाम (48)
इतरो सुण अजमाल मेणादे , आपो दीन्हो खोय ।
पिता सायर माॅ मॅगनीदे रा , पीन्जर घायल होय (49)
नैतलदे पङदे मे उबा , फूट फूट ने रोय ।
रुणीचै मे मातम छायो , रुदन करै हर कोय (50)
इतरो देख रामसा बोल्या , रुदन करो ना कोय ।
मॅगल गाओ मन समझाओ , होणी है सो होय (51)
राजी खुशी घोर खिणाओ , करो उदासी आगी ।
आज म्हानै भोम समाधि , लेवण री लिव लागी (52)
इतरो कह समझावण लाग्या , सुण लीज्यो नर नारी ।
जै थै मासू प्रीत करो तो , बात मानजो म्हारी (53)
निवत बुलाजो मेघरिखो ने , जम्मा जगाजो भारी ।
जमलै मे मिल भ्रांत भांगजो , सो ही प्रीत हमारी (54)
पायो पॅथ पीरानो मै , ध्यायो धरम निजारी ।
ज्यामे नूर समश गोसाई , सदरपीर महाभारी(55)
धिन हो मेघ महाधर्म ने , बारम्बार बलिहारी ।
सबका मालिक एक लखाया , सोही सीख हमारी (56)
पाखण्ड हिन्सा दूर भगाजो , बणजो साचं पुजारी ।
निर्मल हो निकलॅक ने ध्यावो , पावोला सुख भारी (57)
मात पिता गुरु दीन हीन रा , रैईजो सेवाधारी ।
इतरा दे उपदेश रामसा , घोर खिणाई सारी (58)
घोर खिणी जद पूरणं पाया , घोर मे सैलाणं ।
डालीबाई कह गिया सो - परगटिया प्रमाण (59)
परगट वै प्रमाण दैखने , किन्हो फेर बखाणं ।
हे महा सति सिद्ध डाली थारी , मोङी पङी पिछाण (60)
पङदे राखी भगति डाली , पङदै भली पकाई ।
पङदै मे प्रमाणिया , पङदे भली समाई (61)
कहै रामदै डालीबाई री , रैला ज्योत सवाई ।
मेघवॅश रो मान बढायो , धिन हो डालीबाई (62)
इतरो कह तुॅवर वॅश ने , फरमावे एक बात ।
लेऊ समाधि पाछै कोई , ना करजो उत्पात (63)
म्है तो जावा परम धाम , थै शॅको ना लाइजो ।
पीढी पीढी पीर होवेला , थे पद पीराई पाईजो (64)
इतरो कहता आप घोर मे , किन्हो है प्रवेश ।
लिवी समाधि रामदेवजी , भला दिया उपदेश (65)
गुन्जै है कण कणं मे बाबो , धिनं मरुधर रो देशं ।
कहै मेघ रिख रामचन्द्र , वे अमर हुआ दरवेश (66)
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( हङबू जी रो अणेसो )
हङबू जी सिद्ध साची कीन्ही , रामापीरं सू प्रीत ।
लिवी समाधि रामदेव जद , भली निभाई रीत (टेर)


गावं बेगठी माही हङबू , साॅखला सिरदार ।
वै सुगनो रा पारखी , सिद्ध हुआ सचियार (67)
घणा चावता रामदेव ने , राख स्नेही भाव ।
मिलता रामापीर सु - वै , हिवङै राख उमाव (68)
रामदेवजी लिवी समाधि , हो गिया भवपार ।
तिजोङे दिन हङबू जी ने , पूगिया समचार (69)
इतरो सुण हङबू जी चाल्या , होय गाडे असवार ।
जावता रुणीचै हङबू , किन्हा घणा विचार (70)
इणी मारगो माही बाबो , घोङलियो घुमावता ।
जद रामसापीर म्हारै , गाॅव बेगंठी आवता (71)
कदै रामसा इणी मारगो , सामी ही मिल जावता ।
हिवङै सू लिपटाय म्हानै , भाई कह बतलावता (72)
हर काम काज रै माही म्हानै , सन्देशो भिजवावता ।
क्यो म्हानै विसराया बाबो , समाधि लगावता (73)
समाधि री वैला बाबो , जै म्हानै बुलावता ।
तो आखरी वैला मे वारा , दरशणिया व्है जावता (74)
करै अणेसो भारी हङबू , आसुङा ढलकावता ।
विरह वियोगी होया हङबू , गाव रुणीचै जावता (75)
हङबू जी ने सदमो लाग्यो , ओरण माही आवता ।
बैचैतै विचार किन्हा , सुगनिया मनावता (76)
जोणे कोई पोङ बाजै , घुॅघरिया छमकावता ।
ओरण माही जोवण लाग्या , नैणो ने भुंवावता (77)
सुद्धी बुद्धी खोई सारी , इतरा वै चावता ।
मानस माही छाया बाबो , पचरॅगो लहरावता (78)
भावना सू बाबो दीसे , घोङलियो चरावता ।
गाडो रोक हङबूजी हेठा , उतरै हर्षावता (79)
जोणे बाबो बोलै उभा , मुखङो मुलकावता ।
साॅभलै हङबू जी उभा , उणियारो निहारता (80)
कहै रामदै आओ भाई , हङबू जी महाराजं ।
पवन वेग ज्यू गाडो लेय , किया पधारो आज (81)
थोरै नैणा माही हङबू , नीर ढलै किण काज ।
कह बतलाओ साची म्हानै , काई नैणा मे राजं (82)
हङबू बोल्या सुणो रामसा , धोखो होयो म्हानै ।
मै सुणियो थे रुणिचै मे , लीवी समाधि छाने (83)
कूङा वे समचार रामसा , होय गिया अब काने ।
हङबू रै जिव नेहचो होयो , देख रामसा थाने (84)
देख स्नेह सिद्ध हङबूजी रो , भली बन्धावे धीर ।
जाओ हङबू आप रुणीचै , रामसरोवरं तीर (85)
रामसरोवरं तीर माथै , बाजै बीणा मॅजीर ।
ओठे हॅशा हीर चुगै , अ'र - चालै सुधा समीर (86)
ओठे जा सगला ने दीजो , म्हारोङा जुहार ।
पीर फकीर सॅत मिलै तो , खम्मा घणी हजार (87)
इण विध उण सुरताई सू , हङबू करी हथाई ।
ऐङो मानस भयो दिवानो , वे जूनी प्रीत निभाई (88)
विरह वियोगी मानस काजं , हङबू रैया अजाण ।
रामदेव री वा सुरताई , पाया नही पिछाण (89)
हङबू जाणे रामदेव जी , नही पायो निर्वाण ।
जोण जीवता रामदेव ने , होग्या भरम अडाण (90)
राजी हो रुणीचै हङबू , जावे है तत्तकाल ।
जाय देखियो मेलो भारी , रामसरोवरं पाल (91)
तुॅवर सारा शोक मनावे , बेठा जाजम ढाल ।
झालर बीणा नगाङा बाजै , भजन करै जयपाल (92)
देख समाधि माथे मेलो , हङबू कहे सगला ने ।
सुण लीज्यो थे भाया म्हारी , साच कहु मै थानै (93)
ओरणं माही घोङ चराता , बाबो मिलिया म्हानै ।
घणी हथाई किन्ही म्हासु , दिया जुहारा थानै (94)
वात सुणी जद हङबू जी री , तुवरो किया विचार ।
घोर खिणाओ पाछी भायो , जद होवे ऐतबारं (95)
के' तो रामदेव जी झूठा , के' हङबूजी सिरदार ।
तुरन्त फैसलो होसी भायो , होवेला निस्तार (96)
इतरो सुणं जयपाल बोल्या , घोर उघाङो नाही ।
हङबू जी ने वहमं हुओ कोई , विरहं वेदना माही (97)
रिखिया थोने अर्ज करै थे , मति करो मुरखाई ।
क्यो भुलिया ठाकरो , थे - रामापीर सिद्धाई (98)
तुॅवर कहै रिखं अलगा रीजो , मति करो चतुराई ।
जाण लेवसा रामदेव री , कैङी है सिद्धाई (99)
लैय समाधि पाछै कॅईया , फिरै वनो रै माई ।
हर हाल माही घोर उघाङ , देखोला पीराई (100)
हाथो माही लिया पावङा , ओर लीवी हलबाणी ।
तहस नहस कर नाखी तुवरो , रामापीर निशाणी (101)
रिखिया बेबस उभा देखे , नैणो मे भर पाणी ।
उणी बखत सिद्ध रामदेव री , पङदे गूॅजी वाणी (102)
तुॅवरो थोने मना कियो पण , नही मान्या थे बात ।
बैरी जैङो काम कियो थे , कियो पीठ मे घात (103)
तुॅवर वॅश रै माही पीरो - वाली ना तकदीर ।
पेट गुजारो करता रैईजो , बोल्या रामापीरं (104)
हङबू जी रो दोश नही , वे साचा म्हारा सैण ।
प्रीत पुरबली कारणे , मै छायो वारै नैणं (105)
तुॅवरो थे विश्वासं गमायो , शब्दो रे सबूतो मे ।
हङबू जेङो स्नेहं भाव , ना पायो मै रजपूतो मे (106)
इतरो कह सिद्ध रामदेवं री , वाणी व्हेगी शान्त ।
तुवर पश्चातापं कियो , अ'र मेटी मोयली भ्रान्त (107)
पाछै घोर चिणाई तुरबत , पीरो री पहचोणं मे ।
मेघवॅशी रिख रामचन्द्र , गाया पद प्रमाण मे (108)
----------( इति श्री 108 मनका )----------

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शनिवार, 27 मई 2017

बाबा साहेब अपने अंतिम दिनो मे रोते हुए पाये गये

बाबासाहब अपने अन्तिम दिनो मेँ अकेले रोते हुऐ पाये गये।

बाबासाहेब अम्बेडकर को जब काका कालेलकर कमीशन 1953 मेँ मिलने के लिए गए, तब कमीशन का सवाल था कि, #आपने सारी जिन्दगी पिछङे वर्ग के उत्थान के लिए लगा दी। आपकी राय मेँ उनके लिए क्या किया जाना चाहिए?

 बाबासाहब ने जवाब दिया कि, अगर पिछङे वर्ग का ऊत्थान करना है तो इनके अन्दर बडे लोग पैदा करो।

काका कालेलकर यह बात समझ नही पाये। उन्होंने फिर सवाल किया " बङे लोगों से आपका क्या तात्पर्य है?"

बाबासाहब ने जवाब दिया कि, *अगर किसी समाज मेँ 10 डॉक्टर, 20 वकील और 30 इंजीनियर पैदा हो जाऐ, तो उस समाज की तरफ कोई आँख उठाकर भी देख नही सकता।

"इस वाकये के ठीक 3 वर्ष बाद 18 मार्च 1956 मेँ आगरा के रामलीला मैदान मेँ बोलते हुऐ

बाबासाहेब ने कहा "मुझे पढे लिखे लोगों ने धोखा दिया। मै समझता था कि ये लोग पढ लिखकर अपने समाज का नेतृत्व करेंगे मगर मैँ देख रहा हुँ कि, मेरे आस-पास बाबुओं की भीड़ खड़ी हो रही हैँ, जो अपना ही पेट पालने मे लगी है। "यही नहीँ, बाबासाहब अपने अन्तिम दिनों मे अकेले रोते हुऐ पाये गये। जब वे सोने की कोशिश करते थे, तो उन्हें नही आती थी।

अत्यधिक परेशान रहते थे। परेशान होकर उनके स्टेनो नानकचंद रत्तु ने बाबासाहब से सवाल पूछा कि, आप इतना परेशान क्योँ रहते है?

उनका जवाब था, "नानकचंद, ये जो तुम दिल्ली देख रहो हो; इस अकेली दिल्ली मे 10,000 कर्मचारी, अधिकारी यह केवल अनुसूचित जाति के है; जो कुछ साल पहले शून्य थे।
मैंने अपनी जिन्दगी का सब कुछ दांव पर लगा दिया, अपने लोगों में पढे लिखे लोग पैदा करने के लिए। क्योंकि मै समझता था कि, मै अकेला पढकर इतना काम कर सकता हूँ, अगर हमारे हजारो लोग पढ लिख जायेगे तो इस समाज मे कितना बङा परिवर्तन आयेगा। मगर नानकचंद, मै जब पुरे देश की तरफ निगाह डालता हूँ तो मुझे कोई ऐसा नौजवान नजर नहीँ आता है, जो मेरे कारवाँ को आगे ले जा सके।

अगर आप कुछ करना चाहते हो तो उसके लिए आगे आना होगा।
सब चाहते है भगत सिंह पैदा हों किन्तु मेरे घर नही पडोसी के घर में।

लेकिन हम अपने घर में भगत सिंह को पैदा ही नही खुद भगत सिंह बनना भी चाहते हैं।

 
तो आय हमारे साथ।
युवाओं को जगाना है, भारत देश बचाना है!!!
हम राजनीती करने नही, राजनीती बदलने आ रहे है।

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शनिवार, 3 सितंबर 2016

क्या है पूना पैक्ट.??






"पूना पैक्ट और आरक्षण"


-अर्चना बौद्ध

क्या है पूना पैक्ट.??


ब्रिटिश प्रधानमंत्री सर रैमजे मैकानाल्ड ने 17 अगस्त 1932 ई० को कम्युनल एवार्ड की घोषणा की उसमें दलितों के पृथक निर्वाचन की मांग को स्वीकार कर लिया था।

जब गांधी जी को इसकी सूचना मिली, तो उन्होंने इसका विरोध किया और 20 सितम्बर 1932 ई ० को इसके विरोध में यरवदा जेल में आमरण अनशन करने की घोषणा कर दी।

महात्मा गाँधी जहां पृथक निर्वाचन के विरोध में अनशन कर रहे थे वही पर डॉ० अम्बेडकर के समर्थक पृथक निर्वाचान के पक्ष में खुशियाँ मना रहे थे इसलिए दोनों समर्थकों में झड़पें होने लगी। तीसरे दिन गाँधी जी की दशा बिगड़ने लगी तब डॉ.अम्बेडकर पर दबाव बढ़ा कि वह अपनी पृथक निर्वाचन की मांग को वापस ले लें किन्तु उन्होंने अपनी मांग वापस न लेने को कहा। उधर गाँधी जी भी अपने अनशन पर अड़े रहे।

इन दोनों के बीच सर तेज बहादुर सप्रू बात करके कोई बीच का रास्ता निकालने का प्रयास कर रहे थे। 24 सितम्बर 1932 ई० को सर तेज बहादुर सप्रू ने दोनों से मिलकर एक समझौता तैयार किया जिसमें डॉ.आंबेडकर को पृथक निर्वाचन की मांग को वापस लेना था और गाँधी जी के दलितों को केन्द्रीय और राज्यों की विधान सभाओं एवं स्थानीय संस्थाओं में दलितों की जनसंख्या के अनुसार प्रतिनिधित्व देना एवं सरकारी नौकरियों में भी प्रतिनिधित्व देना था। इसके अलावा शैक्षिक संस्थाओं में दलितों को विशेष सुविधाएं देना भी था। दोनों नेता इस समझौते पर सहमत हो गये। 24 सितम्बर 1932 को इस समझौते पर सहमत हो गये। 24 सितम्बर 1932 ई० को इस समझौते पर गाँधी जी और डॉ. अम्बेडकर ने तथा इनके सभी समर्थकों ने अपने हस्ताक्षर कर दिए।

इस समझौते को "पूना पैक्ट" कहा गया।

आजकल फेसबुक पर कोई भी मुह उठाकर आरक्षण के विरोध में अपने तर्क एक ज्ञानी की तरह देता है । ज्ञानियों के तर्क कुछ इस प्रकार होते है-

१-आरक्षण का आधार गरीबी होना चाहिएहै

२- आरक्षण से अयोग्य व्यक्ति आगे आते है।

३- आरक्षण से जातिवाद को बढ़ावा मिलता है।

४- आरक्षण ने ही जातिवाद को जिन्दा रखा है।

५- आरक्षण केवल दस वर्षों के लिए था।

६- आरक्षण के माध्यम से सवर्ण समाज की वर्तमान पीढ़ी को दंड दिया जा रहा है।

इन ज्ञानियों के तर्कों का जवाब प्रोफ़ेसर विवेक कुमार जी ने दिया है जो इस प्रकार हैं -

१- पहले तर्क का जवाब:-

आरक्षण कोई गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है, गरीबों की आर्थिक वंचना दूर करने हेतु सरकार अनेक कार्य क्रम चला रही है और अगर चाहे तो सरकार इन निर्धनों के लिए और भी कई कार्यक्रम चला सकती है। परन्तु आरक्षण हजारों साल से सत्ता एवं संसाधनों से वंचित किये गए समाज के स्वप्रतिनिधित्व की प्रक्रिया है। प्रतिनिधित्व प्रदान करने हेतु संविधान की धरा 16 (4) तथा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 330, 332 एवं 335 के तहत कुछ जाति विशेष को दिया गया है।

२- दूसरे तर्क का जवाब

योग्यता कुछ और नहीं परीक्षा के प्राप्त अंक के प्रतिशत को कहते हैं। जहाँ प्राप्तांक के साथ साक्षात्कार होता है, वहां प्राप्तांकों के साथ आपकी भाषा एवं व्यवहार को भी योग्यता का माप दंड मान लिया जाता है अर्थात अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के छात्र ने किसी परीक्षा में 60 % अंक प्राप्त किये और सामान्य जाति के किसी छात्र ने 62 % अंक प्राप्त किये तो अनुसूचित जाति का छात्र अयोग्य है और सामान्य जाति का छात्र योग्य है।

आप सभी जानते है की परीक्षा में प्राप्त अंकों का प्रतिशत एवं भाषा, ज्ञान एवं व्यवहार के आधार पर योग्यता की अवधारणा नियमित की गयी है जो की अत्यंत त्रुटिपूर्ण और अतार्किक है। यह स्थापित सत्य है कि किसी भी परीक्षा में अनेक आधारों पर अंक प्राप्त किये जा सकते हैं। परीक्षा के अंक विभिन्न कारणों से भिन्न हो सकते है। जैसे कि किसी छात्र के पास सरकारी स्कूल था और उसके शिक्षक वहां नहीं आते थे और आते भी थे तो सिर्फ एक। सिर्फ एक शिक्षक पूरे विद्यालय के लिए जैसा की प्राथमिक विद्यालयों का हाल है, उसके घर में कोई पढ़ा लिखा नहीं था, उसके पास किताब नहीं थी, उस छात्र के पास न ही इतने पैसे थे कि वह ट्यूशन लगा सके। स्कूल से आने के बाद घर का काम भी करना पड़ता। उसके दोस्तों में भी कोई पढ़ा लिखा नहीं था। अगर वह मास्टर से प्रश्न

पूछता तो उत्तर की बजाय उसे डांट मिलती आदि। ऐसी शैक्षणिक परिवेश में अगर उसके परीक्षा के नंबरों की तुलना कान्वेंट में पढने वाले छात्रों से की जायेगी तो क्या यह तार्किक होगा।

इस सवर्ण समाज के बच्चे के पास शिक्षा की पीढ़ियों की विरासत है। पूरी की पूरी

सांस्कृतिक पूँजी, अच्छा स्कूल, अच्छे मास्टर, अच्छी किताबें, पढ़े-लिखे, माँ-बाप, भाई-बहन, रिश्ते-नातेदार, पड़ोसी, दोस्त एवं मुहल्ला। स्कूल जाने के लिए कार या बस, स्कूल के बाद ट्यूशन या माँ-बाप का पढाने में सहयोग। क्या ऐसे दो विपरीत परिवेश वाले छात्रों के मध्य परीक्षा में प्राप्तांक योग्यता का निर्धारण कर सकते हैं?

क्या ऐसे दो विपरीत परिवेश वाले छात्रों में भाषा एवं व्यवहार की तुलना की जा सकती है?

यह तो लाज़मी है की सवर्ण समाज के कान्वेंट में पढने वाले बच्चे की परीक्षा में प्राप्तांक एवं भाषा के आधार पर योग्यता का निर्धारण अतार्किक एवं अवैज्ञानिक नहीं तो और क्या है?

३- तीसरे और चौथे तर्क का जवाब

भारतीय समाज एक श्रेणीबद्ध समाज है, जो छः हज़ार जातियों में बंटा है और यह छः हज़ार जातियां लगभग ढाई हज़ार वर्षों से मौजूद है। इस श्रेणीबद्ध सामाजिक व्यवस्था के कारण अनेक समूहों जैसे दलित, आदिवासी एवं पिछड़े समाज को सत्ता एवं संसाधनों से दूर रखा गया और इसको धार्मिक व्यवस्था घोषित कर स्थायित्व प्रदान किया गया।

इस हजारों वर्ष पुरानी श्रेणीबद्ध सामाजिक व्यवस्था को तोड़ने के लिए एवं सभी समाजों को बराबर –बराबर का प्रतिनिधित्व प्रदान करने हेतु संविधान में कुछ जाति विशेष को आरक्षण दिया गया है। इस प्रतिनिधित्व से यह सुनिश्चित करने की चेष्टा की गयी है कि वह अपने हक की लड़ाई एवं अपने समाज की भलाई एवं बनने वाली नीतियों को सुनिश्चित कर सके। अतः यह बात साफ़ हो जाति है कि जातियां एवं जातिवाद भारतीय समाज में पहले से ही विद्यमान था।प्रतिनिधित्व ( आरक्षण), इस व्यवस्था को तोड़ने के लिए लाया गया न की इसने जाति और जातिवाद को जन्म दिया है। तो जाति पहले से ही विद्यमान थी

और आरक्षण बाद में आया है।

अगर आरक्षण जातिवाद को बढ़ावा देता है तो, सवर्णों द्वारा स्थापित समान-जातीय विवाह, समान-जातीय दोस्ती एवं रिश्तेदारी क्या करता है?

वैसे भी बीस करोड़ की आबादी में एक समय में केवल तीस लाख लोगों को नौकरियों में आरक्षण मिलने की व्यवस्था है, बाकी 19 करोड़ 70 लाख लोगों से सवर्ण समाज आतंरिक सम्बन्ध क्यों नहीं स्थापित कर पाता है?

अतः यह बात फिर से प्रमाणित होती है की आरक्षण जाति और जातिवाद को जन्म नहीं देता बल्कि जाति और जातिवाद लोगों की मानसिकता में पहले से ही

विद्यमान है।

४- पांचवे तर्क का जवाब

प्रायः सवर्ण बुद्धिजीवी एवं मीडिया कर्मी फैलाते रहते हैं कि आरक्षण केवल दस वर्षों के लिए है, जब उनसे पूंछा जाता है कि आखिर कौन सा आरक्षण दस वर्ष के लिए है तो मुह से आवाज़ नहीं आती है। इस सन्दर्भ में केवल इतना जानना चाहिए कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए राजनैतिक आरक्षण जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 में निहित है, उसकी आयु और उसकी समय-सीमा दस वर्ष निर्धारित की गयी थी। नौकरियों में अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षण की कोई समय सीमा सुनिश्चित नहीं की गयी थी।

५- छठे तर्क का जवाब

आज की सवर्ण पीढ़ी अक्सर यह प्रश्न पूछती है कि हमारे पुरखों के अन्याय, अत्याचार, क्रूरता, छल कपटता, धूर्तता आदि की सजा आप वर्तमान पीढ़ी को क्यों दे रहे है?

इस सन्दर्भ में दलित युवाओं का मानना है कि आज की सवर्ण समाज की युवा पीढ़ी अपनी ऐतिहासिक, धार्मिक, शैक्षणिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक पूँजी का किसी न किसी के रूप में लाभ उठा रही है। वे अपने पूर्वजों के स्थापित किये गए वर्चस्व एवं ऐश्वर्य का अपनी जाति के उपनाम, अपने कुलीन उच्च वर्णीय सामाजिक तंत्र, अपने सामाजिक मूल्यों, एवं मापदंडो, अपने तीज-त्योहारों, नायकों, एवं नायिकाओं, अपनी परम्पराओ एवं भाषा और पूरी की पूरी ऐतिहासिकता का उपभोग कर रहे हैं।

क्या सवर्ण समाज की युवा पीढ़ी अपने सामंती सरोकारों और सवर्ण वर्चस्व को त्यागने हेतु कोई पहल कर रही है?

कोई आन्दोलन या अनशन कर रही है?

कितने धनवान युवाओ ने अपनी पैत्रिक संपत्ति को दलितों के उत्थान के लिए

लगा दिया या फिर दलितों के साथ ही सरकारी स्कूल में ही रह कर पढाई करने की पहल की है?

जब तक ये युवा स्थापित मूल्यों की संरचना को तोड़कर नवीन संरचना कायम करने की पहल नहीं करते तब तक दलित समाज उनको भी उतना ही दोषी मानता रहेगा जितना की उनके पूर्वजों को।

याद रखिये

मंदिरों में घुसाया जाता है .....

जाति देखकर

किराये पर कमरा दिया जातै है...

जाति देखकर

होटल में खाना खिलाया जाता है..

जाति देखकर

कमरा किराये पर दिया जाता है..

जाति देखकर

मकान बेचा जाता है...

जाति देखकर

शादी विवाह कराये जाते है

जातिया देखकर,,,

वोट दिया जाता है..

जाति देखकर

मृत पशु उठवाये जाते है..

जाति देखकर

गाली दी जाती है..

जाति देखकर

साथ खाना खाते है..

जाति देखकर

बेगार कराई जाती है..

जाति देखकर

धिक्कारा जाता है..

जाति देखकर

बाल काटे जाते है..

जाति देखकर

ईर्ष्या पैदा होती है..

जाति देखकर

बलात्कार होते है ...

जाति देखकर

पर बेशर्मों आपको आरक्षण चाहिये आर्थिक आधार पर......

जाति आधारित समाज में समता के लिए आरक्षण लोकतांत्रिक राष्ट्र में अत्यावश्यक है...

क्योंकि जाति है तो आरक्षण है.....

जातियां समाप्त करो

आरक्षण अपने आप संमाप्त हो जायेगा !

आरक्षण हमारी मांग नहीं थी , वरन 'प्रथक निर्वाचन' थी | एक बार फिर से उठाकर देख लो 'पूना पैक्ट' |

आरक्षण हमें 'प्रथक निर्वाचन' की मांग के बदले में दिया गया है |

अगर तुमने आरक्षण हटाने की बात की तो हम फिर से अपनी मांग 'प्रथक निर्वाचन' के लिए लड़ेंगे

जय भीम, जय भारत

~ साभार मिशन आंबेडकर
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रविवार, 7 अगस्त 2016

बुध्ध की मूर्ति राष्ट्रपति भवन में क्यों ?

बुध्ध की मूर्ति राष्ट्रपति भवन में क्यों ?

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दोस्तों...राष्ट्रपति भवन में गौतम बुध्ध की मूर्ति लगाई गई है। यह बुध्ध की मूर्ति बे-वजह नहीं बल्कि काफी सोच समझ कर और गहन मंथन कर लगाई गई है।
राष्ट्रपति भवन में अक्सर विश्व के दूसरों देशो के राष्ट्रपति , प्रधानमंत्री और शासनाध्यक्ष आते रहते हैं। भारत में बुध्ध ही एक महामानव है जिसकी सारे विश्व में पहचान बनी है । सारे विश्व के लोग बुध्ध को जानते हैं । बुध्ध के शांति के संदेश से सारा विश्व परिचित हैं। आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति की आवश्यकता जरूरत बन चुकी है।
दोस्तों...ब्राह्मा , विष्णु , महेश ,गणेश , परशुराम , दुर्गा , मनु को कौन जानता है विश्व में ? ? ? किसी के चार सिर , किसी के दश हाथ , किसी के हाथ में भाला , किसी के हाथ में त्रिशूल , किसी के हाथ में तलवार ? ? ?
इन काल्पनिक अपरिचितो की मूर्ति लगाकर विश्व में भारत की जग-हसाई करना है क्या ???
इन हिंसक देवी देवता की मूर्ति को राष्ट्रपति भवन में देखकर हमारा देश भारत तत्काल आतंकी देश घोषित हो जाता और फिर इसे रोक पाना भी संभव नहीं होता।
देश की इज्जत-आबरु बचाने में बुध्ध ही पर्याप्त है..।
तो चलो बुध्ध की ओर
भवतु सब्ब मंगलम् ...


एक आवश्यक सूचना ।
अम्बेडकरवादी साहित्य डाक द्वारा घर बेठे मंगवाने के लिए संपर्क करे।
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मंगलवार, 26 जुलाई 2016

एक थी फुलन देवी - अबला बनी सबला




नोट :- पोस्ट पाढ़ने के बाद ताई फूलन देवी की आँखों में जररु देखें आप सच्चे है , तो संघर्ष जरूर महसूस करंगे !!




आप उस दर्द को महसूस करिए जब एक खास राजपूत समुदाय के कई लोगों ने तकरीबन 15 साल की एक लड़की के साथ बलात्कार किया होगा. इस तरह के दर्द और जलालत को झेलने के बाद आप क्या करते, शायद वही जो फूलन देवी ने किया. उन्होंने लाइन में खड़ा कर 22 ठाकुरों को गोलियों से भून डाला. हालांकि फूलन देवी ने इस घटना को कभी स्वीकार नहीं किया.

फूलन देवी का जन्म 10 अगस्त 1963 को उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के एक छोटे से गांव गोरहा का पूर्वा में निषाद (मल्लाह) जाति के देवीदीन और मूला देवी के घर हुआ. जब फूलन 11 साल की हुई, आर्थिक तंगी की वजह से उसकी शादी उससे उम्र में कई साल बड़े एक आदमी से करवा दी गई. आप यह जानकर हैरान रह जाएंगे कि यह शादी एक गाय के बदले कर दी गई. अपने पति के रवैये से तंग आकर फूलन ने पति का घर छोड़ दिया और वापस मां-बाप के पास आकर रहने लगी. मायके आने पर घऱवालों ने भी उनका साथ नहीं दिया. हालात ऐसे बने कि गांव के ठाकुरों की नजर अकेली फूलन को देखकर खराब होने लगी. जब फूलन तकरीबन पंद्रह साल की थी तो ठाकुरों के एक गैंग ने फूलन देवी को जबरन उठा लिया और दो हफ्ते तक बारी-बारी से उसका बलात्कार करते रहे. इस अपमान और पीड़ा से गुजरी फूलन ने इस अपमान का बदला लेने की खातिर समाज से विद्रोह करते हुए बीहड़ की तरफ चली गई. बीहड़ में बागियों से जुड़ने के बाद फूलन ने धीरे-धीरे खुद का एक गिरोह बना लिया. सन् 1980 के दशक में वह चंबल के बीहड़ों मे सबसे खतरनाक डाकू मानी जाती थी. सन् 1981 में वह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में तब आई, जब उसने ऊंची जातियों के बाइस लोगों को एक साथ गोली मार दी. फूलन देवी की छवि राबिनहुड की थी. उन्हें गरीबों का पैरोकार माना जाता था.





उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बीहड़ों में सक्रिय फूलन देवी को पकड़ने के लिए इन दोनों जगहों की सरकार और प्रतिद्वंदी गिरोहों ने बहुत कोशिश की लेकिन वो सफल नहीं हो सके. इस बीच फूलन का नजदीकी साथी विक्रम मल्लाह मारा गया; जिसके बाद फूलन कमजोर पड़ने लगी. फूलन भी भागते भागते बीहड़ की जिंदगी से ऊबने लगी. हालांकि उनको डर था कि आत्मसमर्पण करने की स्थिति में पुलिस उनको और उनके साथियों को कहीं मार न दे और उनके परिवार के लोगों और समर्थकों को नुकसान ना पहुंचाए. कांग्रेस की सरकार में उन्होंने मध्य प्रदेश के तात्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह की उपस्थिति में 12 फरवरी 1983 को इस समझौते के तहत अपने दर्जन भर समर्थकों के साथ आत्म समर्पण कर दिया कि उनको मृत्यु दंड नहीं दिया जाएगा. उनके आत्म समर्पण के समय उनके हजारों समर्थक मौजूद थे. जेल में रहते हुए ही फूलन देवी ने बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा लेकिन हार गई. बिना मुकदमा चलाए फूलन देवी ने 11 साल तक जेल में बिताया. सन् 1994 में मुलायम सिंह यादव की सरकार ने उन्हें जेल से रिहा कर दिया. उन पर ‘बैंडीट क्वीन’ नाम से एक फिल्म भी बनी, जिसने उन्हें काफी प्रसिद्धी सहानुभूति दिलाई.





अपनी रिहाई के बाद फूलन देवी ने धम्म का रास्ता अपनाते हुए बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया. उन्होंने एकलव्य सेना का भी गठऩ किया. उन्होंने राजनीति की राह ली और उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर से सांसद चुनी गईं. वह दो बार सांसद रही. सन् 2001 में केवल 38 साल की उम्र में दिल्ली में सरकारी आवास के बाहर ही 25 जुलाई 2001 को फूलन देवी की हत्या कर दी गई. फूलन देवी के हत्यारे ने इस हत्या को ठाकुरों की सामूहिक हत्या का बदला कहा.





फूलन देवी के जीवन संघर्ष को विदेशों में भी सलाम किया गया. ब्रिटेन में आउटलॉ नाम की एक किताब प्रकाशित हुई है जिसमें उनके जीवन के कई पहलुओं पर चर्चा की गई है. फूलन देवी को मिली जेल की सजा के बारे में पढ़ने के बाद लेखक रॉय मॉक्सहैम ने 1992 में उनसे पत्राचार शुरू किया. जब फूलन देवी ने उनके पत्र का जवाब दिया तो रॉय मॉक्सहैम भारत आए और उन्हें फूलन देवी को करीब से जानने का मौका मिला. बीबीसी के साथ बातचीत में लेखक रॉय ने फूलन देवी के साथ अपनी दोस्ती को याद करते हुए कहा था कि उन्होंने जिंदगी में बहुत कुछ सहा, लेकिन इसके बावजूद फूलन देवी बहुत हंसमुख थी. वे हमेशा हंसती रहती थी, मजाक करती रहती थीं. हालांकि उन्होंने अपना बचपन गरीबी में गुजारा. मुझे लगता है कि वे गलत न्यायिक प्रक्रिया का शिकार हुई. उन्हें नौ साल जेल में बिताने पड़े. लेखक रॉय मॉक्सहैम का यह भी कहना है कि जेल से रिहा होने के बाद जब फूलन देवी सांसद बन गई तो उनमें अन्य नेताओं वाले कोई नाज नखरे नहीं थे. एक बार मैं उनके घर गया तो वे अपना फ्लैट खुद साफ कर रही थीं क्योंकि उन्होंने नौकर रखने से इनकार कर दिया था. वे कहते हैं कि इस बात में कोई शक नहीं कि फूलन देवी एक हीरो थीं.




सन् 2011 में प्रतिष्ठित टाइम मैगजीन ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर प्रकाशित अपने अंक में फूलन देवी को इतिहास की 16 सबसे विद्रोही महिलाओं की सूची में चौथे नंबर पर रखा. इस अंक में टाइम मैगजीन ने फूलन देवी के बारे में लिखा कि उन्हें भारतीय गरीबों के संघर्ष को आवाज देने वाले के रूप में याद किया जाएगा.





साभार-दलित दस्तक
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एक थी डेल्टा – PART 7 Write by Bhanwar meghwanshi

एक थी डेल्टा – 7
हत्या के बाद चरित्र हत्या !! 
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पश्चिमी राजस्थान के अत्याचार प्रभावित क्षेत्र बाड़मेर जिले की प्रतिभाशाली दलित छात्रा कुमारी डेल्टा मेघवाल का शव 29 मार्च 2016 को श्री आदर्श जैन कन्या शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय के हॉस्टल परिसर की पानी की टंकी में मिला .डेल्टा के पिता महेंद्रा राम को इस बात की सूचना दोपहर एक बजे दी गई ,वो देर रात 12 बजे नोखा पहुंचे .30 मार्च 2016 को सुबह 8 .30 पर उनकी ओर से नोखा थाने में संस्थान के संचालक ईश्वर चंद वैद ,पीटीआई विजेन्द्रसिंह ,वार्डन प्रिया शुक्ला तथा वार्डन के पति प्रज्ञा प्रतीक शुक्ला के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज करवाई गई ,जो भारतीय दंड संहिता की धारा 302 ,376 (ग ) 201 ,34 एवं पोक्सो कानून की धारा 5 तथा 6 और अनुसूचित जाति ,जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 की धारा 3 (1 ) (12 ) के तहत दर्ज की गई .
एक होनहार दलित छात्रा के साथ बलात्कार करने के बाद उसकी निर्मम हत्या करके उसे सामान्य मौत बताने के लिए पानी के कुण्ड में लाश को डुबो देने का समाचार सोशल मीडिया के ज़रिये बाड़मेर तथा नोखा के जागरूक दलित बहुजन युवाओं की पहल पर देश भर में फेल चुका था .रोहित वेमुला के सांस्थानिक मर्डर से पहले से आक्रोशित दलित बहुजन समाज के लिए कुमारी डेल्टा की बलात्कार बाद हत्या असहनीय घटना बन गया .लोग नोखा में ही धरने पर बैठ गये तथा नामजद आरोपियों की गिरफ्तारी होने तक डेल्टा के शव को लेने से मना कर दिया .आक्रोश इतना भयंकर था कि डेल्टा के शव का पोस्ट मार्टम भी दोषियों की धरपकड़ के बाद ही करने के लिए लोग अड़ चुके थे .
डेल्टा की हत्या से गुस्साये लोग सड़कों पर उतर आये .नोखा तो संघर्ष स्थली बना हुआ ही था .देश भर के उच्च शिक्षण संस्थान भी उबले हुये थे .आई आई टी ,जे एन यू ,सेन्ट्रल विश्वविध्यालय सब तरफ विरोध प्रदर्शन जारी थे .बाड़मेर जिला जबरदस्त गुस्से में था .राजस्थान सहित देश और विदेश तक जस्टिस फॉर डेल्टा अभियान उफान पर था .लोग न्याय मांग रहे थे ,डेल्टा के हत्यारों को गिरफ्तार देखना चाहते थे .
बीकानेर पुलिस द्वारा नामजद आरोपियों में से पीटीआई विजेन्द्रसिंह , वार्डन प्रिया शुक्ला ,वार्डन पति प्रज्ञा प्रतीक शुक्ला को पूंछताछ के लिये पकड़ लिये जाने के बाद 31 मार्च 2016 की दोपहर 12 बजकर 30 मिनिट पर डेल्टा की हत्या के लगभग 72 घंटे बाद शव का पोस्टमार्टम किया गया .पोस्टमार्टम की रिपोर्ट कहती है कि डेल्टा के दोनों फेफड़े स्वस्थ पाये गये है ,मतलब उनमे पानी नहीं भरा .पेट में मात्र 500 मिलीलीटर पानी पाया गया ,जो किसी भी स्वस्थ व्यक्ति में भी पाया ही जाता है ,इसका आशय यह है कि डेल्टा की मौत पानी में डूबने से नहीं हुई .उसके शरीर पर चौटों के निशान पाये गये .जो उसके साथ हुए बलात्कार की कहानी चीख चीख कर कहती है .डॉक्टर्स की ओपिनियन भी स्पष्ट थी - मौत का कारण तथा बलात्कार की पुष्टि एफ एस एल रिपोर्ट से ही होगी .मगर अफ़सोस इस बात का है कि डोक्टरी जैसे पवित्र माने जाने वाले पेशे में लगे लोग भी उच्च स्तरीय दबाव में आये और उन्होंने नामजद आरोपियों को बचाने की नीयत से रीओपिनियन देते हुए कह दिया कि – डेल्टा की मौत पानी में डूबने से होने के सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है .पोस्टमार्टम के वक्त दलित समुदाय से आने वाले एक डॉक्टर ने मेडिकल बोर्ड के साथ जमकर बहस की लेकिन एक अंधे व्यक्ति को भी जो घटना मर्डर दिख रही थी ,नोखा का पुलिस महकमा और मेडिकल बोर्ड उसे पानी में डूबने से हुई मौत स्थापित करने में तुला हुआ था .
डेल्टा के हत्यारे इतने शातिर और रसूख वाले लोग है कि उन्होंने डेल्टा के परिजनों और उसके शुभचिंतकों के पंहुचने से पहले ही सब कुछ मैनेज कर लिया था .चूँकि जैन संस्थान का अध्यक्ष ईश्वर चंद वैद सत्तारूढ़ पार्टी में ऊँची पंहुच रखने वाला व्यक्ति है ,इसलिए सूबे की मुख्यमंत्री तक उसने अपने बचाव के लिए पहले से ही प्रबन्ध कर लिये थे .
जिस मुख्यमंत्री वसुंधराराजे ने डेल्टा को उसके द्वारा बनाये गये चित्रों के लिए बधाई दी थी ,वही मुख्यमंत्री महोदया डेल्टा के मामले में एकदम संवेदनहीन हो गई तथा 4 अप्रैल को उनसे डेल्टा के लिए मिलने गये प्रतिनिधिमंडल को पूंछा – तुम लोग पीटीआई विजेन्द्रसिंह के पक्ष में आये हो या विपक्ष में ? प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि – हम विजेन्द्रसिंह के खिलाफ मिलाने आये है .यह सुनते ही संवेदनशील महिला मुख्यमंत्री महोदया अपने पद की गरिमा भी भूल गई और उसने ऐसी बात कह डाली जो शायद कोई भी संवेदनशील व्यक्ति नहीं कह सकता है . मुख्यमंत्री ने साफ कहा कि – “ उस लड़की के तो शिक्षक विजेन्द्रसिंह से अवैध सम्बन्ध थे .तुम लोग धरना प्रदर्शन करके पुरे देश में हल्ला मचा रहे हो ,इससे हमारी नाक कट रही है ,यह गलत है .” यह कह कर राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधराराजे डेल्टा के लिए न्याय मांगने गये प्रतिनिधिमंडल से बात किये बगैर ही आगे बढ़ गई .
न्याय की आशा लेकर सुदूर रेगिस्तान से सूबे की राजधानी पंहुचे लोग भारी मन से वापस लौट आये .मुख्यमंत्री महोदय यही तक नहीं रुकी .राज्य सरकार के इशारे पर डेल्टा के चरित्र हनन का अभियान शुरू हो गया .पुलिस के आला अफसरान ने बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस करके मुख्यमंत्री द्वारा कही गई बात की ताकीद करते हुए कहा कि पीटीआई और छात्रा के मध्य अवैध सम्बन्ध थे .पुलिस ने पोक्सो एक्ट में दिए गये दिशा निर्देशों की धज्जियाँ उड़ाते हुए लड़की को चरित्रहीन साबित करने के लिए काल डिटेल का सहारा लिया ,मीडिया में अपनी मूर्खतापूर्ण खबरें प्लांट करवाई .राजस्थान की पूरी सरकार और उसकी मशीनरी यह साबित करने की कोशिस कर रही थी कि मृतक दलित छात्रा ही ठीक नहीं थी .उसका चरित्र ख़राब था .जैसे वो कहना चाहते थे कि शायद वो इसी तरह की मौत की हक़दार थी ! क्या कोई संवेदन शील सरकार इतनी संवेदनहीन हो सकती है ?
पर राजस्थान की सरकार ने अमानवीयता की सारी हदें लांघते हुए पहले ही दिन से यह तय कर लिया कि डेल्टा की हत्या आत्महत्या थी और वह ठीक लड़की नहीं थी .सूबे की मुख्यमंत्री की डेल्टा के प्रति नफरत इस हद तक बढ़ चुकी थी कि वह एक बलात्कारी का नाम तो अपनी जबान से ले रही थी ,मगर एक पीड़ित दलित छात्रा का नाम तक अपनी जुबान से लेना उन्हें गवारा नहीं था .उस शासन से न्याय की क्या उम्मीद की जा सकती थी ,उसकी पुलिस डेल्टा के परिजनों को क्या न्याय दे सकती है ?
कुमारी डेल्टा के पिता महेंद्रा राम मेघवाल बहुत दुखी हो कर बताते है कि –“ मुझे मुख्यमंत्री जी से बेहद उम्मीद थी कि मेरी बेटी की हत्या के मामले की निष्पक्ष जाँच करवाएगी ,लेकिन उन्होंने तो बिना जाँच के ही डेल्टा की चरित्र हत्या कर दी ,उसे अवैध सम्बन्ध रखने वाली बता दिया .मुख्यमंत्री के इस कथन से मुझे सदमा लगा है ,मैं बहुत आहत हुआ हूँ . बेटी की बलात्कार के बाद निर्मम हत्या की जाँच की फरियाद ले कर पंहुचे एक दुखी बाप को राज्य की मुख्यमंत्री द्वारा इस तरह कलंकित कर निकाला गया ,जिसकी मैं कल्पना भी नहीं कर सकता हूँ .इतना ही नहीं बल्कि मुख्यमंत्री महोदया ने उसी दिन बीकानेर के पुलिस महानिरीक्षक से प्रेस कांफ्रेंस करवाई और लड़की के अवैध संबंधों की बात जगजाहिर की तथा मेडिकल बोर्ड से री ओपिनियन जारी करवाई .इससे पता चलता है कि आरोपियों की पकड़ इस सरकार में कितनी उपर तक है .इनसे मैं निष्पक्ष जाँच और न्याय की क्या उम्मीद कर सकता हूँ “
डेल्टा के साथ बलात्कार तथा उसकी जघन्य हत्या के बाद पुलिस की भूमिका ,स्वयं मुख्यमंत्री द्वारा डेल्टा को चरित्रहीन बताना .पुलिस द्वारा पहले ही दिन से पानी में डूबकर सुसाईड करने की कहानी दोहराना तथा शव के अंतिम संस्कार कर दिए जाने के बाद मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को बदलवा देना और बाद में पुलिस द्वारा प्रेस कांफ्रेंस करके डेल्टा के चरित्र पर आक्षेप लगाना .यह सब डेल्टा के सुनियोजित सांस्थानिक मर्डर को साबित करने के लिये काफी है .हम कह सकते है कि डेल्टा के साथ जैन संस्थान में बलात्कार किया गया ,उसके बाद साक्ष्य मिटाने के लिए उसे मार डाला गया .चूँकि जैन संस्थान का मालिक ईश्वरचंद आर एस एस तथा बीजेपी से जुड़ा हुआ व्यक्ति है ,इसलिए उसे बचाने के लिए राजस्थान की सरकार ने डेल्टा की चरित्र हत्या की और अंततः पुलिस ने अपने आकाओं के इशारे पर इस जघन्य हत्या को आत्महत्या साबित करते हुए चार्जशीट पेश करने का दुष्कर्म कर दिखाया .....( जारी ) 
Justice For Delta Meghwal‬
- भंवर मेघवंशी
( लेखक सामाजिक कार्यकर्ता एवं स्वतंत्र पत्रकार है तथा राजस्थान में दलित बहुजनों के प्रश्नों पर लम्बे समय से कार्यरत है . उनसे bhanwarmeghwanshi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है .व्हाट्सएप – 9571047777 )
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शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

एक जिन्दा देवी - बसपा सुप्रीमो बहन मायावती जी

बहन जी पर आज ये लेख पढ़ा बहुत ही अच्छा लगा और यह लेख उनके आलोचकों को जवाब भी है। दुनियाँ है कुछ भी बोल सकती है लेकिन उनका संघर्ष बहुतों के लिए प्रेरणा बन सकता है।
मायावती उसी साल पैदा हुई, जिस साल बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर का परिनिर्वाण हुआ. 15 जनवरी 1956 को मायावती ने इस दुनिया में आंखें खोली तो तकरीबन 11 महीने बाद 6 दिसंबर को बाबासाहेब ने आंखें मूंद ली. जैसे निश्चिंत हो गए हो कि चलो कोई जिम्मेदारी संभालने वाला आ गया. मायावती 15 जनवरी, 2013 को अपने जुझारु और कर्मठ जीवन के 56 साल पूरे कर रही हैं. इस बीच वह कुमारी मायावती से ‘बहन जी’ बन चुकी हैं. आज के वक्त में बहुजन समाज पार्टी और कुमारी मायावती एक-दूसरे के पूरक हैं. बहुजन समाज पार्टी के पिछले 28 वर्षो के सफ़र पर नज़र डाले तो ये जानने में ज्यादा समय नहीं लगेगा की बसपा के संस्थापक कांशीराम की तरह ही मायावती पार्टी की उन्नति की प्रमुख वजह रही है.
सन 1977 में जब दिल्ली के करोलबाग में रहकर कांशीराम अपनी नेतागिरी को आगे बढ़ा रहे थे, तब उन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय की एक छात्रा ने बहुत ही प्रभावित किया. लॉ फैकल्टी की 21 वर्षीय छात्रा अनुसूचित जाति के अधिकारों व सम्मान की लड़ाई की सोच वाली एक ऐसी युवा थी, जिससे कांशीराम के आन्दोलन को धार मिली. ये युवा छात्रा ही मायावती थी. तब मायावती सिविल सर्विस परीक्षा की तैयारी करती थीं. अपनी आत्मकथा में मायावती ने लिखा है, 'मेरे विचार और लक्ष्य समझते हुए कांशीराम जी ने मुझे समझाया कि 'तुम्हारे अंदर कलक्टर बनने की काबिलियत है और नेता बनने की भी, लेकिन यदि तुम नेता बनीं तो ऐसे कई कलक्टर तुम्हारे पीछे फाइलें लिए खड़े रहेंगे. उनकी मदद से तुम दबे-कुचले शोषित समाज का अधिक उत्थान कर सकती हो.' मायावती स्वीकार करती हैं कि मान्यवर कांशीराम ने उन्हें एक सपना दिया, पथ प्रदर्शन किया.
मायावती की जीवनी लिखने वाले अजॉय बोस लिखतें है की 'कांशीराम, मायावती के साथ बहुत अच्छा भावनात्मक जुड़ाव रखते थे. कांशीराम का गुस्सैल स्वभाव, खरी-खरी भाषा व जरूरत पड़ने पर हाथ के इस्तेमाल पर मायावती की तर्कपूर्ण खरी-खरी बातें भारी पड़ती थी. समान आक्रामक स्वभाव वाले दलित चेतना के लिए समर्पित इन दोनों लोगो के काम का अंदाज़ जुदा होते हुए भी एक दुसरे का पूरक था, जहां कांशीराम लोगो से घुलना मिलना, राजनैतिक संघर्ष और गपशप में यकीन रखते थे वही मायावती अंतर्मुखी रहते हुए राजनैतिक बहसों को समय की बर्बादी मानती थीं. मायावती का ये अंदाज़ अब भी बरकरार है. वे आज भी चुपचाप अपना काम करती हैं. राजनैतिक अटकलबाजियों में ना तो वो खुद शामिल होती हैं ना ही पार्टी के कार्यकर्ताओं को शामिल होने देती हैं.
अस्सी के दशक में जब वे आम अध्यापिका थीं तब भी वे अपनी शख्सियत के मुताबिक़ पूछा करती थी "अगर हम हरिजन की औलाद हैतो क्या गांधी शैतान की औलाद थे." अपने इसी तेजतर्रारी व खरी तेजाबी जुबान से जब उन्होंने वर्णवादी व्यवस्था को मनुवादी कह कह कर हिंदी क्षेत्रों में लताड़ना शुरू किया तो वर्षो से दबे हुए दलित समाज ने उन्हें अपनी आवाज़ और अपने लिए युद्धरत एक सिपाही पाया. कांग्रेस में वोटबैंक की मानिंद सिमटे रहने वाले दलित अधिकारी नेता अब आज़ाद महसूस करने लगे और अस्सी के दशक का ‘हरिजन’ कब राजनैतिक व्यक्तित्व को प्राप्त कर 'दलित' बन गया ये पता ही नहीं चला.
मायावती को समझने के लिए उनकी आत्मकथा 'मेरा संघर्षमय जीवन एवं बहुजन समाज मूवमेंट का सफरनामा' के पन्ने पलटने होंगे. हर चेतना संपन्न दलित की तरह मायावती में भी दलित आंदोलन की पहली समझ बाबा साहब डा. अंबेडकर की जीवनी और उनकी किताबें पढ़कर आई. इन किताबों से मायावती का पहला परिचय उनके पिता ने कराया. मायावती अपनी आत्मकथा में लिखती हैं, 'तब मैं आठवीं में पढ़ती थी. एक दिन मैने पिताजी से पूछा कि अगर मैं भी डा.अंबेडकर जैसे काम करूं तो क्या वे मेरी भी पुण्यतिथि बाबा साहब की तरह ही मनाएंगे?'
मायावती के विरोधी भले ही उनको लेकर मनगढ़ंत कहानियां गढ़ते फिरे और उन पर तानाशाही का आरोप लगाते रहें, मायावती का राजनीतिक जीवन इतना आसान नहीं रहा है. मायावती पहले बामसेफ और फिर डीएस फोर में सक्रिय हुईं. दोनों संगठनों की स्थापना क्रमश: 1978 और 1981 में हुई थी. उस समय इन संगठनों से मायावती का जुड़ाव यह साबित करता है कि सत्ता उनका साध्य नहीं थी. वह खुद तय किए उद्देश्य के लिए लड़ रही थीं. यह वह समय था जब दलित आंदोलन का कोई भविष्य नहीं दिखता था. कोई मानने को तैयार नहीं था कि बहुजन आंदोलन कभी सफल भी होगा. मायावती आज जिस मुकाम पर हैं, वहां तक पहुंचने के लिए उन्होंने कड़ा संघर्ष किया है. निजी जिंदगी में परिवार के स्तर पर भी उन्होंने बहुत तकलीफें सही. 1984 में बहुजन समाज पार्टी बनने पर ही मायावती सक्रिय राजनीति में उतरीं, लेकिन पिता उनके राजनीति में जाने के विरोधी थे. पिता ने कहा कि अगर कांशीराम का साथ नहीं छोड़ा तो उन्हें परिवार से अलग कर दिया जाएगा. अपनी आत्मकथा में मायावती लिखती हैं, 'पिता जानते थे लड़की घर छोड़कर नहीं जा सकती. उन्होंने मुझ पर दबाव बनाया, लेकिन मैंने उनकी नहीं सुनी.' इसके बाद मायावती ने घर छोड़ दिया. उनका साथ दिया बड़े भाई ने. पास में था तो बस सात साल की नौकरी से बचा कुछ पैसा. वह कहती हैं कि 'मैं भाई के साथ अलग कमरा लेकर रहती थी. कमरा कांशीराम जी ने दिलवाया था. जल्दी ही लोगों ने दुष्प्रचार शुरू कर दिया.' खुद कांशीराम ने भी लिखा है कि राजनीति में प्रवेश करते ही मायावती की बेहिसाब मुश्किलें शुरू हो गईं.'
अपनी पहली राजनीतिक जीत के लिए उन्हें कई साल का इंतजार करना पड़ा. 1984 में बसपा के गठन के बाद से ही मायावती ने कैराना से चुनावी सफ़र शुरू किया. इस मुकाबले में जीत तो कांग्रेस प्रत्याशी की हुई, पर मायावती ने भी अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराई. इस चुनाव में मायावती ने 44,445 वोटों के साथ तीसरा स्थान प्राप्त किया. फिर आया 1985 बिजनौर का उपचुनाव. इस चुनाव में वह 61,504 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहीं. मायावती को चाहने वालों की तादात बढ़ रही थी और साथ ही वोटों की संख्या भी. 1987 में हरिद्वार सीट से 1,25,399 वोटों के साथ वह दूसरे स्थान पर रही. 1988 के महत्वपूर्ण इलाहाबाद की लोकसभा सीट के उपचुनाव में वी पी सिंह व कांग्रेस के अनिल शास्त्री के एतिहासिक मुकाबले में तीसरी बड़ी दावेदारी कांशीराम के नेतृत्व में इसी बहुजन समाज पार्टी ने पेश किया. इतने प्रयासों के बाद सन् 1989 में बिजनौर से 1,83,189 वोटों के साथ वे पहली बार संसद के लिए चुन ली गई.
1984 में 'बीएसपी की क्या पहचान, नीला झंडा-हाथी निशान' व बाबा तेरा मिशन अधूरा मायावती करेंगी पूरा, के नारों के साथ बसपा ने 1993 में सपा (पिछड़े मुस्लिम) व बसपा (अति पीछड़े व दलित) गठबंधन कर, ‘मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम’ का नारा दिया. लगा भाजपा के पूरे राम मंदिर आंदोलन को धुल चटा सवर्णों के धर्म व राजनैतिक आंदोलन की रीढ़ ही तोड़ दी गई है. कांशीराम की तरह वे उत्तर प्रदेश से बाहर की नहीं थी. वे यूपी की बेटी थी, वे दलित के बेटी थी. मायावती की इसी ज़मीनी पकड़ और आक्रामकता के चलते 1989 में बसपा महज दो लोकसभा सीटो पर 9.93 फीसदी मत से बढ़कर 1999 आते आते 14 सीट और 22.8 फीसदी मतों पर पहुंच गई.
1995 में भाजपा के साथ हाथ मिला दलित की ये बेटी पहली दलित महिला मुख्यमंत्री बन गई. हर देश के अलावा देश के बाहर के लोगों के लिए भी एक अचंभे की बात थी. यह वह वक्त था, जब मायावती विश्व के फलक पर अचानक एक कद्दावर नेता के रूप में उभरी थी. उनकी इन्हीं उपलब्धियों की बदौलत प्रतिष्ठित ‘न्यूज वीक' पत्रिका उन्हें दुनिया की आठ सर्वाधिक ताकतवर महिलाओं में शुमार कर चुकी हैं. मुख्यमंत्री का पद संभालने के बाद उन्होंने बहुजन नायकों और बहुजन हितों पर खासा ध्यान दिया. मायावती ने अम्बेडकर ग्राम योजना लाकर अनुसूचित जाति बहुल गांव में सरकारी निवेश को बढ़ा दिया. थानों में दलित अधिकारियों की नियुक्ति कर दलित उत्पीडन पर रोक लगा दी व दलित महापुरुषों के नाम पर नए जिले घोषित कर दलितों को मोह लिया. तब से ही दलितों के साथ ही पछड़े वर्ग में भी मायावती का खासा प्रभाव रहा. सी एस डी एस की रिपोर्ट को माने तो सन 1996 में बसपा को 27% कुर्मी, 24.7% कोईरी वोट मिले. समाजवादी पार्टी तो मायावती और बसपा के बढ़ते कदम से इतनी बौखला गई कि उसके लोगों ने मायावती पर हमला तक कर दिया. मुलायम की पार्टी के कुछ लोगों द्वारा गेस्ट हॉउस में मायावती के ऊपर किये गए जानलेवा हमले में सवर्ण नेताओं खासकर ब्रह्मदत्त द्विवेदी द्वारा बचाई गई मायावती ने सन् 2005 में बसपा में ही सवर्ण नेतृत्व उभारना शुरू कर दिया. इसको वकील से यूपी के महाधिवक्ता बनाये गए सतीश चन्द्र मिश्र ने मूर्त रूप दे डाला. मायावती ने सवर्ण और ब्राह्मण नेताओं को ज्यादा महत्त्व देना कांशीराम द्वारा बनाया गया 15 बनाम 85 फीसदी का बहुजन सामाजिक समीकरण को 25% दलित, 9% ब्राह्मण+20% अति पिछड़ों का समीकरण कर दिया. कांग्रेस के जाते ही जो ब्राह्मण नेतृत्व विहीन हो गए थे वे सतीशचंद्र के नेतृत्व में 2007 में बड़ी संख्या में बसपा से जुड़े, यहां तक की 42 ब्राह्मण जीतकर बसपा की पहली बार बने पूर्ण बहुमत सरकार का हिस्सा बने. यह सब मायावती की बेहतरीन राजनीतिक सूझ-बूझ का ही नतीजा था. उनके विरोधी भले ही कुछ भी कहें, लेकिन ताज एक्सप्रेस वे और बुद्ध इंटरनेशनल सर्किल मायावती के मुख्यमंत्रित्वकाल की ऐसी उपलब्धि है, जिसके बारे में उनके राजनीतिक प्रतिद्वंदी सोच भी नहीं सकते थे. वरिष्ठ लेखिका अरुणधति राय भी विरोधियों के इसी कुप्रचार का शिकार थीं. लेकिन नोएडा में बुद्ध इंटरनेशनल सर्किल पर देखने के बाद अपने एक संस्मरण में उन्होंने मायावती के तारीफ के पुल बांधे थे.
प्रशासक के रूप में ‘बहन जी’ का तेवर हमेशा उग्र रहा है और उन्होंने समझौता नहीं किया. उत्तर प्रदेश के एक बड़े किसान नेता महेन्द्रसिंह टिकैत द्वारा एक जन सभा में जिसमें, अजीत सिह भी मौजूद थे, मायावती को गालियां दी गई. बहन जी ने टिकैत की गिरफ्तारी का आदेश दिया. टिकैत बिजनौर से मजबूत आधार वाले अपने गांव सिसौली (मुजफ्फर नगर) लौट आया. गांव की घेराबन्दी कर दी गई. पानी बिजली काट दी गई. अंत में बड़बोला टिकैत अपनी औकात में आ गया. उसने गिरगिराते हुए मुख्यमंत्री मायावती से माफी मांगी और उसको गिरफ्तार कर लिया गया. वहीं मुलायम राज को पटखनी देकर तब सत्ता में पहुंची मायावती ने यूपी के बड़े-बड़े गुंडों को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया. कई अंडरग्राउंड हो गई. सख्त प्रशासन के लिए विपक्षी भी उनका लोहा मानते हैं. चाहे किसी जाति या धर्म का व्यक्ति हो, प्रदेश की आम जनता ने बसपा शासन में हमेशा सुरक्षित महसूस किया. खासकर महिलाओं ने एक महिला मुख्यमंत्री के प्रसाशन को काफी पसंद किया. ‘चढ़ गुंडो की छाती पर मुहर लगेगी हाथी पर’ जैसे नारे एक वक्त उत्तर प्रदेश की फिजाओं में खूब गूंजे थे. मायावती ने हमेशा से अपनी कड़क छवि के अनुरूप ही काम किया. बहुजन नायकों के सम्मान को लेकर भी मायावती हमेशा सचेत रहीं. यह तब देखने को मिला जब 2007 में उन्होंने लखनऊ के अंबेडकर स्मारक के रख रखाव में कोताही बरतने के कारण कुछ अधिकारियों को निलंबित कर दिया. मायावती का पूरा ध्यान दलितों के हित साधने में रहा. उनके द्वारा बैकलाग की भर्तियों पर बार-बार पूछताछ जारी रही. दलित कोटे को पूरा करना और महत्वपूर्ण पदों पर उन्हीं के लोगों की तैनाती इस बात को दर्शाती भी रही.
अपने राजनीतिक गुरु, सचेतक और बसपा के संस्थापक मान्यवर कांशीराम जी के गुजरने के बाद मायावती को झटका लगा. लेकिन तब तक वे परिपक्व हो चुकी थीं. एक वक्त ऐसा भी आया जब कई बड़े नामों ने बसपा का साथ छोड़ दिया. इनमें बसपा को कई साल देने वाले सलेमपुर के पूर्व सांसद बब्बन राजभर हो, बलिया से ही कांशीराम के साथी पूर्व सांसद बलिहारी बाबू हो, इलाहबाद से इंडियन जस्टिस पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष कालीचरण सोनकर हो या फिर आजमगढ़ के सगड़ी के नेता मल्लिक मसूद तमाम लोग पार्टी से अलग हो गए. इसमें से कई आज कांग्रेस की शोभा बढ़ा रहे है. लेकिन कुछ ऐसे लोग भी रहें तो ‘बहन जी’ के पीछे साए की तरह खड़े रहें. इनमें कांशीराम के सेक्रेट्री अम्बेथ राजन व पार्टी के बिहार प्रभारी गांधी आज़ाद जैसे प्रतिबद्ध दलित कार्यकर्ता हैं. अम्बेथ राजन का संगठन कांशीराम व अन्य दलितों को दिल्ली में मूलभूत सुविधाएं देता था. आज भी वे उसी प्रकार की सेवाएं बसपा का खजांची बन कर दे रहे हैं.
मायावती के जीवन संघर्ष पर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग के प्रो. विवेक कुमार ने पिछले दिनों अपने एक लेख में लिखा था, ‘यह विडंबना है कि लोग आज मायावती के गहने देखते हैं, उनका लंबा संघर्ष और एक-एक कार्यकर्ता तक जाने की मेहनत नहीं देखते. वे यह जानना ही नहीं चाहते कि संगठन खड़ा करने के लिए मायावती कितना पैदल चलीं, कितने दिन-रात उन्होंने दलित बस्तियों में काटे. मीडिया इस तथ्य से आंखें मूंदे है. जाति और मजहब की बेड़ियां तोड़ते हुए मायावती ने अपनी पकड़ समाज के हर वर्ग में बनाई है. वह उत्तर प्रदेश की पहली ऐसी नेता हैं, जिन्होंने नौकरशाहों को बताया कि वे मालिक नहीं, जनसेवक हैं. अब सर्वजन का नारा देकर उन्होंने बहुजन के मन में अपना पहला दलित प्रधानमंत्री देखने की इच्छा बढ़ा दी है. दलित आंदोलन और समाज अब मायावती में अपना चेहरा देख रहा है. भारतीय लोकतंत्र को समाज की सबसे पिछली कतार से निकली एक सामान्य महिला की उपलब्धियों पर गर्व होना चाहिए....!!!
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सडक से संसद तक दलित अत्याचार की गुंज - हीरा बोस

गुजरात के बहुजन साथियो ने जो घोषना की उनको सून कर मूझे खुशी हुई कि अब वे मृत पशु को नही उठाऐगे । यहां तक कहां कि अगर ब्राहमन गाय को माता मानता है तो गाय का अंतिम संस्कार वोही करे । जीवित गाय माँ है तो मरने बाद भी माँ ही होती है तो शर्म किस बात की ।
उना गांव के चार दलितो को इसलिय पीटा गया कि वो मृत गाय की खाल उतार रहे थे जो उनका खानदानी पैशा है । उनके पुरखे भी यह काम करते आये है । वहां उन लोगो को पीटने वाले RSS और शिव सेना के गुण्डे लोगो के साथ प्रशासन भी था । जिस लाठी से पीठा वो सिर्फ पुलिस के पास ही होती है । इतना ही नही उनके पिता जो माफी मांग रहे थे उनको भी बेरहमी से पीठा गया ।


उना के दलितो की पीटाई का विडियो वायरल हुआ तो सबके होश उङ गये । गुजरात के विभिन्न नगरो मे दलितो ने प्रदर्शन करना शुरु कर दिया । 19 जुलाई 2016 को पुरा गुजरात बन्द कर दिया । गुच्छाये दलितो ने सरकारी बसो आदि की तोङफोङ कर आन्दोलन को उग्र कर दिया । जिससे गुजरात सरकार के साथ केन्द्र सरकार भी कांप गई । बसपा सुप्रीमो बहन मायावती जी ने इस मुद्दे को राज्यसभा मे उठाकर इस अत्याचार की गुँज सङक से संसद तक गुँजा दी । देश के कोने कोने मे विभिन्न अम्बेडकरवादी संगठनो ने आन्दोलन शुरु कर दिया है ।
गुजरात आग की तरह जल रहा था , दुसरी ओर एक और घटना घटित हो गई । इस आग मे घी डालने का काम किया । बसपा सुप्रीमो बहन मायावती जी के उपर राजपुत दयाशंकर के नाम बीजेपी उपी के उपाध्यक्ष ने अपशब्द कहे । इस घटना से उपी सहित संसद, अम्बेडकरवादी संगठन आदि भङक उठे । बाद मे बीजेपी के पद से हठाया , छः साल तक बीजेपी पार्टी से निस्काषित भी किया । लेकिन यह मामला कहां थमने वाला था । 21 जुलाई 2016 की सुबह आठ बजे से लखनऊ मे बहन जी के फौलोवर्स की भीङ जमा होने लगी , देखते ही देखते हजारो की तादाद मे जमा होकर अपना शक्ति प्रदशन किया , यह माहोल देखते ही पुलिश प्रशासन के साथ ही सरकार के होश उङ गये ।
इधर राहुल गांधी उना के पीङित परिवार से मिलने पहुँचे । यह भारत के आजादी के बाद दलित अत्याचार के खिलाप एक क्रांति का आगाज था । डांगावास हत्याकांड, डेल्टा मेघवाल कांड, रोहित वेमुला कांड, उना गुजरात कांड जैसी अनगिनत घटनाये से आज दलित पीङित है । उनमे भारी रोश व्याप्त है । आखिर कब तक हम जुल्म की चक्की मे पिसते रहेंगे ।......

लेखक - हीरा बोस, असाङा
whatsapp 8824370228
heeraram.bose@gmail.com
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शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

एक थी डेल्टा –PART 6;WRITE BY BHANWAR MEGHWANSHI

एक थी डेल्टा – 6 

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डेल्टा की रहस्यमय परिस्तिथियों में हुई मौत जो कि वस्तुतः आत्महत्या नहीं है ,बल्कि बलात्कार के बाद की गई हत्या जैसा जघन्य अपराध है .उसे आत्महत्या में तब्दील करने की हरसंभव कोशिस 28 मार्च की रात ही शुरू कर दी गई थी .


पुलिस और कॉलेज प्रशासन का यह कहना कि 28 मार्च की रात में अपने कमरे से डेल्टा गायब थी और वह स्वत: ही पी टी आई विजेन्द्रसिंह के कमरे में पंहुची .यहीं से कहानी संदेहास्पद बनने लगती है .डेल्टा के परिजनों का कहना है कि –“ डेल्टा को रात के अँधेरे से बहुत डर लगता था ,वह अकेले कहीं बाहर नहीं निकलती थी “ ऐसे में यह सवाल लाज़िमी है कि वह हॉस्टल से निकल कर पीटीआई के कमरे तक अँधेरे में गई या उसे कोई ले कर गया ?
वार्डन प्रिया शुक्ला के मुताबिक जब हॉस्टल में डेल्टा नहीं मिली तो उसे बहुत ढूंढा गया और अंततः वह पीटीआई के कमरे में सामान्य स्थिति में पाई गई .बाद में दोनों से माफीनामा लिख कर छोड़ दिया गया .गर्ल्स हॉस्टल की एक प्रतिभावान नाबालिग दलित लड़की का गायब होना और बाद में एक पुरुष पिटीआई के यहाँ मिलना क्या वार्डन और कॉलेज प्रशासन के लिए इतनी सामान्य बात थी कि मामले को वहीँ रफा दफा कर दिया गया ? डेल्टा के स्थानीय अभिभावक ,पुलिस तथा उसके परिजनों को इसकी सुचना देना आवश्यक क्यों नहीं समझा गया ?
जो माफीनामे डेल्टा और विजेन्द्रसिंह से लिखवाये जाने की बात वार्डन प्रिया शुक्ला और उसके पति प्रज्ञा प्रतीक शुक्ला बताते है ,उन दोनों माफीनामों की भाषा और लिखावट एक जैसी क्यों है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि ये माफीनामे डेल्टा की हत्या को आत्महत्या में बदलने के लिए निर्मित किये गये सबूत हो ? पुलिस का आरोप पत्र भी इस बारे में मौन है .चार्जशीट के मुताबित माफीनामों की एफ एस एल रिपोर्ट अभी प्राप्त होना शेष है .
वार्डन का यह कहना कि डेल्टा पीटीआई के क्वाटर में सामान्य स्थिति में थी ,जबकि पुलिस का आरोप पत्र यह कहता है कि मृतका डेल्टा और आरोपी विजेन्द्रसिंह के जब्तशुदा अंडरगारमेंट व बेडशीट पर मानव वीर्य मौजूद पाया गया .जाँच में बलात्कार किये जाने की पुष्टि हो चुकी है .इसका मतलब साफ है कि वार्डन और कॉलेज प्रशासन पीटीआई विजेंद्र को बचाने की भरपूर कोशिस में लगा हुआ था .कहीं ऐसा तो नहीं कि इसमें विजेन्द्रसिंह के अलावा भी कोई दोषी व्यक्ति हो ,जिसको भी बचाया जा रहा हो ? कहीं श्री जैन आदर्श कन्या शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय के प्रबंधन और प्रशासन से जुड़े लोग लड़कियों के यौन शोषण में संलिप्तता रखते हो ,जिनकी हवस की शिकार होने के बाद डेल्टा को सदा सदा के लिए मौत की नींद में सुला दिया गया हो ?

डेल्टा का शव जिस कुण्ड में बरामद हुआ ,उस समेत कोलेज में सात पानी के कुण्ड है ,जिनमे से छह पर ताले लगे हुये थे ,सिर्फ एक वो ही कुण्ड बिना ताले के क्यों रखा गया ,जिसमे गिरने की कहानी निर्मित की गई है ? मानव अधिकार संगठनों की तथ्यान्वेषी रिपोर्ट डेल्टा के पानी में डूबने की पूरी थ्यौरी पर ही कई गंभीर सवाल उठाती है ,रिपोर्ट कहती है कि – “हमारा मानना है कि 5 फुट 6 इंच से भी ज्यादा लम्बी डेल्टा मेघवाल अगर डूबी होती तो 7 बजे सुबह जब लीना व अन्य छात्राओं तथा श्याम शुक्ला ने जब कुण्ड का ढक्कन उठा कर अंदर झांक कर देखा तो जरुर उसमे कुछ ना कुछ दिखता .हमारे दल का मानना है कि कुण्ड का मुंह उपर की तरफ 2 x 2 फिट खुलता है ,लेकिन अन्दर चौडाई संकरी हो जाती है ,लगभग 4 इंच का पत्थर दो तरफ से निकल रहा है जिससे कुण्ड के मुंह से अंदर जाते जाते और छोटा हो जाता है .बिना किसी सहारे कुण्ड में किसी का कूदना आसान नहीं है ,क्यूंकि चौडाई संकरी है और ढक्कन लौहे की मोटी चद्दर का बना होने के कारण बिल्कुल भी नहीं रुकता है .साथ ही डेल्टा हॉस्टल के बाहर करीब 7 बजे निकली है तो हॉस्टल वार्डन प्रिया शुक्ला के ससुर बाहर टहल रहे थे और लीना गुप्ता भी तभी बाहर निकली थी .अन्य लड़कियां भी पीछे ही थी तो वह ढक्कन जो कि बिना जोर से आवाज किये बंद नहीं होता ,जिसकी आवाज हॉस्टल के अंदर तक सुनाई देती है ,उसकी आवाज किसी ने क्यों नहीं सुनी जबकि आधे से जयादा लोग तो उस वक्त बाहर ही घूम रहे थे .अगर डेल्टा ने कुण्ड का ढक्कन उठा कर कूदने की कोशिस की तो ढक्कन उसके सिर पर गिरा होता {क्यूंकि वह ढक्कन एक पल भी बिना पकडे खड़ा नहीं हो सकता है } अगर वह गिरा होता तो सिर पर जरुर चोट आई होती और खोपड़ी की हड्डी भी टूटी होती मगर मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार सिर पर कोई चोट नहीं है ."

पोस्टमार्टम की प्रारम्भिक रिपोर्ट में सिर पर कोई चोट नहीं है तथा डॉक्टर्स की ओपिनियन स्पष्ट थी कि मौत डूबने से नहीं हुई ,क्यूंकि मृतका के फेफड़ों में पानी नहीं पाया गया .लेकिन बाद में डॉक्टर्स की रीओपिनियन ली गई जिसमें –‘ पानी में डूबने से मृत्यु होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है ‘ अंकित किया गया .सवाल यह है कि मेडिकल बोर्ड ने किसके दबाव में यह दोबारा राय दी और अपनी ही पहली ओपिनियन और तथ्यों को बदलने की शर्मनाक कोशिस क्यों की ?यह भी अत्यंत गंभीर तथ्य है कि मेडिकल बोर्ड ने डेल्टा के शव का अंतिम संस्कार हो जाने के बाद अपनी दूसरी राय व्यक्त की ताकि फिर से पोस्टमार्टम करने की सम्भावना ही क्षीण हो जाये .
कुल मिलाकर पुलिस ने कॉलेज प्रशासन द्वारा गढ़ी गई झूठी कहानी पर ही मोहर लगाई .डेल्टा के तथाकथित माफीनामे से लेकर पोस्टमार्टम रिपोर्ट में ओपिनियन बदलने तक की सारी कार्यवाही आदर्श सेवा संस्थान के अध्यक्ष ईश्वर चंद ,वार्डन प्रिया शुक्ला ,उसके पति प्रतीक शुक्ला तथा विजेंद्र सिंह सहित हत्या और बलात्कार के दोषियों को बचाने की कवायद भर दिखाई पड़ती है .वैसे भी जहाँ का पूरा सिस्टम सड़ चुका हो और अपराधियों को संरक्षित करता प्रतीत हो वहां की पुलिस के आरोप पत्र पर कौन यकीन कर सकता है ....( जारी )
- भंवर मेघवंशी
{ लेखक स्वतंत्र पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता है ,जिनसे bhanwarmeghwanshi@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है }

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