BAHUJAN TIME

E-PAPER AND ONLINE MEDIA
हमारे महापुरुष लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
हमारे महापुरुष लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 12 सितंबर 2017

बाबा रामसापीर व डालीबाई की समाधि गाथा

बाबा रामसापीर व डालीबाई की समाधि गाथा


अमर होया जुग माय , सति सिद्ध गावं रुणिचै री पाल ।
धिन हो रामापीर , जियो जुग डालीबाई जयपाल ।।टेर।।
नित रा नेम डालीबाई वन मे , उभा टोगङियो लार ।
ज्यानै चारता आप साम्भलै , झालर री झणकार (1)
झालर ढोल नगारा सुणता , किन्हो सुगन विचार ।
के' कोई जानं चढै हद भारी , के' कोई जावे वार (2)
उणी ठोङ कोई ग्वालो दीसै , पूछै हैलो मार ।
ऐ ढोल कठीनै बाजै बीरा , कैवो नी समचार (3)
ग्वालो कैवै सुण बाई डाली , रुठ्यो पालणहार ।
आज रुणीचै रो राजवी , छोङ रैया सॅसार (4)
रामापीर री घोर खुदे है , रामसरोवरं पाल ।
इण विध विरह वियोग रा , ऐ गुन्ज रैया सुरताल (5)
इतरो सुण बाई डाली बोली , सुण गायो रा ग्वाल ।
म्हारा टोगङा थनै भलाऊ , रैईजै थू रखवाल (6)
ग्वालो कैवै ना बाई डाली , हू ऐकलो ग्वाल ।
गायो भैला टोगङिया , मै कंईया लैऊ सॅभाल (7)
डाली बोली जा रै बीरा , आछो कियो अहसाण ।
जै थू आज कैयो कर लैतो , तो करता सॅत बखाण(8)
टोगङियो रै हाथ फैर बाई , आसुङा ढलकायं ।
सोरा रैईजो गऊ रा जायो , फैर मिलुला नाय (9)
रैईजो अलख भरोसै वन मे , रैईजो सॅघ पिछाण ।
सांझ पङिया घर जावजो , नी रामापीर री आण (10)
इतरो कह बाई डाली जावै , रामसरोवरं पाल ।
जाय कैयो सुण वीर रामदै , ऐकर सामी भाल (11)
हरदम भैला भजन किया , कैई कीन्हा वचन विहार ।
आज डाली नै भूल परा , क्यो जावो हो भव पार (12)
सदा साथ मे जम्मा जगाया , पाठ धरम रा पूर ।
जमलै मे मिल बीणा बजाता , घुरता अनहदं तूर (13)
भैला रहता हैत हरख सू , अब क्यो जाओ दूर ।
थाॅ बिन म्हारी भगति सारी , होसी चकनाचूरं (14)
कहै रामदै सुण बाई डाली , ना मै थासू दूर ।
थाॅ बिन म्हारै नही उगता , हिरदै ग्यान अॅकूर (15)
निर्मल निरभै निकलॅक थारो , अदभुत है ओ नूर ।
अमर थारो नाम रैवैला , जब लग चन्दा सूर (16)
डाली कैवै ना ओ बीरा , म्हानै ना बिलमाय ।
था बिछङिया प्राण जावैला , घङी पलकं रै माय (17)
घोर खुदै सो म्हारी बीरा , थारी अवर खिणायं ।
जिवत समाधि लैसू इणमे , दैवो दया बगसाय (18)
आ काई बात करै बाई डाली , कैयो रामदै आप ।
म्हारै नाम री घोर खुदै , तू क्यो करै धणियाप (19)
भोली बाता मत कर बाई , दै वचना री छाप ।
बोलं वचन जै हार गयी तो , कलॅक लगै अणमाप (20)
भोली बाता नही कहू मै , भैदं कहू प्रमाणी ।
रति फरक ना आवै इणमे , ओलख जो सैनाणी (21)
पाटपिताम्बर खङाऊ शॅखझालर ,जै निकलै सैलाणी ।
तो लीजो आप समाधि उणमे , पारख सैगं सैनाणि(22)
आठी डोरा काॅगसी , जै निकलै प्रमाण ।
वोही समाधि म्हारी होवे , करल्यो खोदं पिछाण (23)
खोद्या खबर पङेला बीरा , होवेला ओलखाण ।
वचन भाख सिद्ध किया पलक मे , प्रगटिया प्रमाण(24)
आठी डोरा कागंसी , निकलिया सैलाण ।
परगट परचो देख रामसा - पीर अचम्भो आण (25)
रुणीचै रा नगर निवासी , उभा करै बखाण ।
धिन हो डाली बाई भला थे , परखाया प्रमाण (26)
रामापीर कैयो बाई डाली , धिन हो बारम्बार ।
थारी भगति रो बल भारी , तू सांची सचियार (27)
थारी माया काया रो , कोई पावेला नही पार ।
आज म्हानै खबर पङी , तू महा सति अवतार (28)
मां मंगनीदै आय डाली ने , हिवङै सू लिपटाय ।
पिता सायर जी आय धिया ने , चूनङली ओढायं (29)
बालपणै री सखियो सारी , झुरै झुरावो गाय ।
डालीबाई ने सीख दिरावै , ज्यू सासरै जाय (30)
मात पिता सू होय विदा बाई , बोलिया पैगाम ।
रिलमिल रीजो सगला जग मे , चोखा करजो काम (31)
भैदभाव कर मानवता ने , मत करजो बदनाम ।
हिन्दू - तुरक एक ही जाणो , एक ही अल्ला राम (32)
इतरो कह बाई डाली जावै , भोम समाधि माय ।
आसण धार अडिग हो बैठी , सुन्न मे सुरत समाय(33)
रामापीर जी दैवै समाधि , डाली भोम समाय ।
डाली रा जयकार गुॅजिया , दशु दिशा रै माय (34)
समाधि रा दर्शण सारु , भीङ लगी हद भारी ।
बाबो रामदै नैजा रोपिया , कर जुमलै री त्यारी (35)
बङा बङा कैई पीर पधारिया , ओर आया सिद्ध भारी ।
झालर शॅख नगाङा बाज्या , बाजी नोपत प्यारी (36)
धूप करण री वैला हुई , धूपो री महकारी ।
डालीबाई री होवे आरती , समाधि सिणगारी (37)
मुॅजो जी रिख पाठ पुरियो , बाबे थरपी झारी ।
रिखिया उभा चॅवर ढोलावे , डाली ने बलिहारी (38)
बाबा रामदे बीणो बजायो , छेङिया सुरताल ।
सभा जुङी हद भारी जमलै , मैलो भयो अपार (39)
ऐङो जम्मो होयो ना होसी , जग मे दूजी बार ।
चौबीस वाणी गायी रामदे , निज अणभै आधार (40)
वाणी बैखरी पार हुई जद , खोल्या मध्यमा द्वार ।
मध्यमा सू आय पश्यन्ति , किन्हो आप निहार (41)
परा वाणी मे आय पहूचिया , हद बैहद सू पार ।
इण विध जमलो आप जगायो , श्रीमुख वाणी सार(42)
वाणी वारता करी प्रेमं सू , बाबो सारी रात ।
घट घट माही किन्हो चान्दणो , मॅगल हुओ प्रभात (43)
प्रभातै री महा आरती , गायी सगला साथ ।
डालीबाई ने निवण करै , जोङ्या सगला हाथ (44)
साल बयालिस चवदासो री , सॅवत है प्रमाण ।
मासं भादवा नवमी सुद , डाली रो निर्वाण (45)
धिन हो डालीबाई - रामसा , पीर री अगवाण ।
मेघवॅशी रिख रामचन्द्र , कीन्ही कथा बखाण (46)
-------------------------------------------
( बाबे री समाधि )
भाग भला धिन गावं रुणिचै , रामसरोवरं पाल रा ।
लैवै समाधि रामदेव , सुत्त सायर जी जयपाल रा (टेर)


दशम री प्रभात रामदे , रिखियो ने फरमाय ।
घोर हमारी खोदो भायो , दैर लगाओ नाय ( 47)
डाली कारण एक दिवस रो , पायो मै विश्राम ।
आज म्हारा मान लिजो , थे आखरी सलाम (48)
इतरो सुण अजमाल मेणादे , आपो दीन्हो खोय ।
पिता सायर माॅ मॅगनीदे रा , पीन्जर घायल होय (49)
नैतलदे पङदे मे उबा , फूट फूट ने रोय ।
रुणीचै मे मातम छायो , रुदन करै हर कोय (50)
इतरो देख रामसा बोल्या , रुदन करो ना कोय ।
मॅगल गाओ मन समझाओ , होणी है सो होय (51)
राजी खुशी घोर खिणाओ , करो उदासी आगी ।
आज म्हानै भोम समाधि , लेवण री लिव लागी (52)
इतरो कह समझावण लाग्या , सुण लीज्यो नर नारी ।
जै थै मासू प्रीत करो तो , बात मानजो म्हारी (53)
निवत बुलाजो मेघरिखो ने , जम्मा जगाजो भारी ।
जमलै मे मिल भ्रांत भांगजो , सो ही प्रीत हमारी (54)
पायो पॅथ पीरानो मै , ध्यायो धरम निजारी ।
ज्यामे नूर समश गोसाई , सदरपीर महाभारी(55)
धिन हो मेघ महाधर्म ने , बारम्बार बलिहारी ।
सबका मालिक एक लखाया , सोही सीख हमारी (56)
पाखण्ड हिन्सा दूर भगाजो , बणजो साचं पुजारी ।
निर्मल हो निकलॅक ने ध्यावो , पावोला सुख भारी (57)
मात पिता गुरु दीन हीन रा , रैईजो सेवाधारी ।
इतरा दे उपदेश रामसा , घोर खिणाई सारी (58)
घोर खिणी जद पूरणं पाया , घोर मे सैलाणं ।
डालीबाई कह गिया सो - परगटिया प्रमाण (59)
परगट वै प्रमाण दैखने , किन्हो फेर बखाणं ।
हे महा सति सिद्ध डाली थारी , मोङी पङी पिछाण (60)
पङदे राखी भगति डाली , पङदै भली पकाई ।
पङदै मे प्रमाणिया , पङदे भली समाई (61)
कहै रामदै डालीबाई री , रैला ज्योत सवाई ।
मेघवॅश रो मान बढायो , धिन हो डालीबाई (62)
इतरो कह तुॅवर वॅश ने , फरमावे एक बात ।
लेऊ समाधि पाछै कोई , ना करजो उत्पात (63)
म्है तो जावा परम धाम , थै शॅको ना लाइजो ।
पीढी पीढी पीर होवेला , थे पद पीराई पाईजो (64)
इतरो कहता आप घोर मे , किन्हो है प्रवेश ।
लिवी समाधि रामदेवजी , भला दिया उपदेश (65)
गुन्जै है कण कणं मे बाबो , धिनं मरुधर रो देशं ।
कहै मेघ रिख रामचन्द्र , वे अमर हुआ दरवेश (66)
--------------------------------------------
( हङबू जी रो अणेसो )
हङबू जी सिद्ध साची कीन्ही , रामापीरं सू प्रीत ।
लिवी समाधि रामदेव जद , भली निभाई रीत (टेर)


गावं बेगठी माही हङबू , साॅखला सिरदार ।
वै सुगनो रा पारखी , सिद्ध हुआ सचियार (67)
घणा चावता रामदेव ने , राख स्नेही भाव ।
मिलता रामापीर सु - वै , हिवङै राख उमाव (68)
रामदेवजी लिवी समाधि , हो गिया भवपार ।
तिजोङे दिन हङबू जी ने , पूगिया समचार (69)
इतरो सुण हङबू जी चाल्या , होय गाडे असवार ।
जावता रुणीचै हङबू , किन्हा घणा विचार (70)
इणी मारगो माही बाबो , घोङलियो घुमावता ।
जद रामसापीर म्हारै , गाॅव बेगंठी आवता (71)
कदै रामसा इणी मारगो , सामी ही मिल जावता ।
हिवङै सू लिपटाय म्हानै , भाई कह बतलावता (72)
हर काम काज रै माही म्हानै , सन्देशो भिजवावता ।
क्यो म्हानै विसराया बाबो , समाधि लगावता (73)
समाधि री वैला बाबो , जै म्हानै बुलावता ।
तो आखरी वैला मे वारा , दरशणिया व्है जावता (74)
करै अणेसो भारी हङबू , आसुङा ढलकावता ।
विरह वियोगी होया हङबू , गाव रुणीचै जावता (75)
हङबू जी ने सदमो लाग्यो , ओरण माही आवता ।
बैचैतै विचार किन्हा , सुगनिया मनावता (76)
जोणे कोई पोङ बाजै , घुॅघरिया छमकावता ।
ओरण माही जोवण लाग्या , नैणो ने भुंवावता (77)
सुद्धी बुद्धी खोई सारी , इतरा वै चावता ।
मानस माही छाया बाबो , पचरॅगो लहरावता (78)
भावना सू बाबो दीसे , घोङलियो चरावता ।
गाडो रोक हङबूजी हेठा , उतरै हर्षावता (79)
जोणे बाबो बोलै उभा , मुखङो मुलकावता ।
साॅभलै हङबू जी उभा , उणियारो निहारता (80)
कहै रामदै आओ भाई , हङबू जी महाराजं ।
पवन वेग ज्यू गाडो लेय , किया पधारो आज (81)
थोरै नैणा माही हङबू , नीर ढलै किण काज ।
कह बतलाओ साची म्हानै , काई नैणा मे राजं (82)
हङबू बोल्या सुणो रामसा , धोखो होयो म्हानै ।
मै सुणियो थे रुणिचै मे , लीवी समाधि छाने (83)
कूङा वे समचार रामसा , होय गिया अब काने ।
हङबू रै जिव नेहचो होयो , देख रामसा थाने (84)
देख स्नेह सिद्ध हङबूजी रो , भली बन्धावे धीर ।
जाओ हङबू आप रुणीचै , रामसरोवरं तीर (85)
रामसरोवरं तीर माथै , बाजै बीणा मॅजीर ।
ओठे हॅशा हीर चुगै , अ'र - चालै सुधा समीर (86)
ओठे जा सगला ने दीजो , म्हारोङा जुहार ।
पीर फकीर सॅत मिलै तो , खम्मा घणी हजार (87)
इण विध उण सुरताई सू , हङबू करी हथाई ।
ऐङो मानस भयो दिवानो , वे जूनी प्रीत निभाई (88)
विरह वियोगी मानस काजं , हङबू रैया अजाण ।
रामदेव री वा सुरताई , पाया नही पिछाण (89)
हङबू जाणे रामदेव जी , नही पायो निर्वाण ।
जोण जीवता रामदेव ने , होग्या भरम अडाण (90)
राजी हो रुणीचै हङबू , जावे है तत्तकाल ।
जाय देखियो मेलो भारी , रामसरोवरं पाल (91)
तुॅवर सारा शोक मनावे , बेठा जाजम ढाल ।
झालर बीणा नगाङा बाजै , भजन करै जयपाल (92)
देख समाधि माथे मेलो , हङबू कहे सगला ने ।
सुण लीज्यो थे भाया म्हारी , साच कहु मै थानै (93)
ओरणं माही घोङ चराता , बाबो मिलिया म्हानै ।
घणी हथाई किन्ही म्हासु , दिया जुहारा थानै (94)
वात सुणी जद हङबू जी री , तुवरो किया विचार ।
घोर खिणाओ पाछी भायो , जद होवे ऐतबारं (95)
के' तो रामदेव जी झूठा , के' हङबूजी सिरदार ।
तुरन्त फैसलो होसी भायो , होवेला निस्तार (96)
इतरो सुणं जयपाल बोल्या , घोर उघाङो नाही ।
हङबू जी ने वहमं हुओ कोई , विरहं वेदना माही (97)
रिखिया थोने अर्ज करै थे , मति करो मुरखाई ।
क्यो भुलिया ठाकरो , थे - रामापीर सिद्धाई (98)
तुॅवर कहै रिखं अलगा रीजो , मति करो चतुराई ।
जाण लेवसा रामदेव री , कैङी है सिद्धाई (99)
लैय समाधि पाछै कॅईया , फिरै वनो रै माई ।
हर हाल माही घोर उघाङ , देखोला पीराई (100)
हाथो माही लिया पावङा , ओर लीवी हलबाणी ।
तहस नहस कर नाखी तुवरो , रामापीर निशाणी (101)
रिखिया बेबस उभा देखे , नैणो मे भर पाणी ।
उणी बखत सिद्ध रामदेव री , पङदे गूॅजी वाणी (102)
तुॅवरो थोने मना कियो पण , नही मान्या थे बात ।
बैरी जैङो काम कियो थे , कियो पीठ मे घात (103)
तुॅवर वॅश रै माही पीरो - वाली ना तकदीर ।
पेट गुजारो करता रैईजो , बोल्या रामापीरं (104)
हङबू जी रो दोश नही , वे साचा म्हारा सैण ।
प्रीत पुरबली कारणे , मै छायो वारै नैणं (105)
तुॅवरो थे विश्वासं गमायो , शब्दो रे सबूतो मे ।
हङबू जेङो स्नेहं भाव , ना पायो मै रजपूतो मे (106)
इतरो कह सिद्ध रामदेवं री , वाणी व्हेगी शान्त ।
तुवर पश्चातापं कियो , अ'र मेटी मोयली भ्रान्त (107)
पाछै घोर चिणाई तुरबत , पीरो री पहचोणं मे ।
मेघवॅशी रिख रामचन्द्र , गाया पद प्रमाण मे (108)
----------( इति श्री 108 मनका )----------

Online buy click here

Share:

शुक्रवार, 25 अगस्त 2017

गाथा वीर मेघमाया की

वीर मेघमाया का इतिहास -ले. दलपत श्रीमाली 

 संदर्भ - महानायक इतिहास दलित संतो का आन्दोलन -- ले. दलपत श्रीमाली


गुजरात मे सिद्धराज सोलंकी नामक राजा अनहिलपुर पाटण राजधानी मे शाशक था... सिद्धराज के समय हमारे

लोगो की स्थिति बडी दुखदायी व पशुमय थी.. गले मे हांडी, पिछवाडे झाडू बांधकर चलना पडता था...

अश्पृश्यता का कहर छाया हुआ था... गांव के बाहर सीम मे रहने मजबूर अछूतो को तब सीमाडिया कहा जाता था....

अैसे अेक सीमाडिया की वसाहत धोलका के नजदीक रनोडा गांव की सीम मे थी....

यह वसाहत मे मेघमाया नामक अेक अछूत सीमाडिया भी रहता था... वह बडा समजदार व क्रान्तिकारी

विचारवाले थे .... रोज रात को अपने लोगो को भजन, किर्तन करते समय जागृति की बाते समजाते थे ..

.यह बातो से लोगो मे गुलामी प्रति अहेसास हो रहा था....

अेक दिन देर रात को रनोडा की यह वसाहत मे लोगो को ईकठ्ठा करके मेघमाया सामाजिक जनजागरण की बाते

समजा रहे थे.. ( दिन को तो यह मुमकिन नही था, मजदूरी व सवर्णो का डर रहता था) जब देर रात यह बाते

समजा रहा था तब पाटण के राजगोर त्रिभोनन पंड्या वहा से गुजर रहा था... रात के सन्नाटे मे त्रिभोवन पंड्या

ने सिमाडीयो की बाते सूनी... वो आगबबूला हो गया... किन्तु ब्राह्मण कभी गुस्सा जाहिर नही करता....

वह कुछ देर बाते सूनकर त्रिभावन पंड्या पाटण की ओर चला गया....

ईस बात का लम्बा समय बित गया... ईघर गुजरात के राजा सिद्धराज ने पाटण मे तालाब खूदाने का काम

शरू करवाया... तालाब की खूदाई के लिऐ ओड जाति को काम दीया गया.... तालाब का काम कर रहे

ओडजाति के लोग के बीच जशमा नामकी बडी खूबसूरत ओड महिला भी काम कर रही थी... अेक दिन

तालाब के काम का निरीक्षण करने आये सिद्धराज ने जशमा को देखा.... जशमा का सुंदर रूप देखकर

सिद्धराज मोहांध हो गया.... उसने जशमा को वश करने डर, लालच का उपयोग किया किन्तु चारित्र्य

की वफादार जशमा सिद्धराज के वश नही हुई... तब सिद्धराज ने जबरदस्ती से जशमा को पाने की ठानी....

यह पता लगते ही जशमा रात को ही पाटण से भाग निकली.... सिद्धराज को पता चला तो जशमा के

पीछे सिपाही दौडाये.... और वह खूद उनके पीछे लगा..... जशमा को पता चला की पीछे सिद्धराज व उनके

सिपाही आ रहे है... तो अपना शील बचाने वढवाण की सीम मे चिता खडकर अपनी जान दे दी.....

दंतकथाओ व बारोटो की कहानीयो मे कहा जाता है कि जशमाने सती होने से सिद्धराज को श्राप

दीया था कि तेरे सहस्त्रलिंग तालाब मे पानी नही आयेगा...

विज्ञान व तर्क से श्राप देने से पानी नही आता यह बात सही नही है.... लेकिन तथ्य तो यह है कि तालाब

का निर्माण करने का कारण बार बार पडनेवाला सुखा ( दुष्काल) था... दुष्काल की वजह से धरती से पानी

नही निकलता क्यो कि पानी सतह से सुख जाता है.... ईसलिऐ तालाब मे पानी नही आया....

किन्तु ब्राह्मणी कथाकारो व बारोटो ने पानी नही आने का कारण जशमा का श्राप बताया है......


पानी तालाब मे नही आने से सिद्धराज की चिन्ता बढ रही थी.... उसका समाधान पाने उसने पंडितो को

बूलाया... पंडितो की यह सभा मे त्रिभोवन पंड्या भी मौजूद था.... सभी पंडितो ने अपने अपने सुझाव दीये....

जब चर्चा हो रही थी तब सभा मे बैठा त्रिभोवन पंड्या के दिमाग मे भयानक षडयंत्र करने का विचार चल रहा था..

त्रिभोवन पंड्या के दिमाग मे रनोडा का सिमाडिया मेघमाया ही बस चूका था.... मेघमाया के विचारो की क्रान्ति

से त्रिभोवन पंड्या डर गया था.... सिद्धराज की न्यायप्रियता के कारण वो खूद माया को मार नही शक्ता था...

किन्तु माया को खत्म करना त्रिभोवन पंड्या के लिऐ जरूरी था... और यही विचार के कारण त्रिभोवन पंड्या

ने खतरनाक षडयंत्र को अमल कराने का प्लान बनाया.... जब सभी पंडित बारी बारी चले गये तब त्रिभोवन

पंड्या राजा सिद्धराज के पास गया और बोला... महाराज तालाब का पानी लाने का हल मै जानता हूं....

तब सिद्धराज ने कहा पंडितजी बताओ तालाब मे पानी कैसे आयेगा ??? तब त्रिभोवन पंड्या ने मौका

पाते ही कहा महाराज तालाब मे पानी लाना हो तो हमे तालाब मे बत्रीस लक्षणा पुरूष का बलि देना पडेगा.....

( नोँध- उस समय ब्राह्मण के कथन को ही परम सत्य व ब्रह्मवाक्य माना जाता था.... कितना भी शक्तिशाली

राजा क्यो न हो... उसे ब्राह्मण की बात व आदेश मानना पडता था...)

बत्रीस लक्षणा पुरूष की बलि देने बात सुनते ही सिद्धराज ने बिना सोचेसमजे ही कहा कि राज्य मे बत्रीस लक्षणा

पुरूष कौन होगा जो बलि देने के लिऐ तैयार होगा ????

जब बात को लाईन पर आते ही त्रिभोवन पंड्या ने मौका देखकर कहा महाराज बत्रिस लक्षणा पुरूष राज्य मे

दो लोग है... अेक आप और दूसरा रनोडा का सीमाडिया माया (वीर मेघमाया).....

सीमाडिया की बात सूनकर सिद्धराज भी चकित रह गया... बोला क्या अछूत भी बत्रिस लक्षणा हो शक्ता है ???

और ईसके खून से तो तालाब अपवित्र हो जायेगा..... ईसलिऐ अछूत की बलि नही ली जायेगी.... मै खूद अपनी

बली दूंगा... यह सिद्धराज ने कहते ही त्रिभोवन पंड्या का षडयंत्र निष्फल होने का खतरा खडा हो गया....

किन्तु ब्राह्मण था.... षडयंत्र को अंजाम देना जानता था.... ईसलिऐ बिना विचलित हुई त्रिभोवन पंड्या बोला....

महाराज आपके बलिदान से तो प्रजा निराधार हो जायेगी... आप प्रजापालक हो... आपका रहना प्रजा व राज्य के

लिए जरूरी है... आप अपनी बलि नही दे शक्ते.... और हमारे शास्त्रो मे लिखे मुताबित अछूत तो हमारी सेवा व

बलि देने के लिऐ ही जन्मे है.... ईससे तालाब का पानी व तालाब अपवित्र नही होगा... क्यो कि बाद मे हम हम

विधि करवाकर पवित्र कर देगे... यह बात समजाई तो सिद्धराज मान गया और सैनिको को हुकम किया कि

मेघमाया सीमाडिया को हाजर करो.... त्रिभोवन पंड्या का षडयंत्र मेघमाया की हत्या करने का था वह सफल

होने जा रहा था तो मंदमंद मुस्कुरा रहा था....

जब सिपाही रनोडा आये और राजा का आदेश माया को सूनाया तो पूरी वसाहत मे हडकंप मच गया... लेकिन

अछूत कर भी क्या शकते थे. ??? सिपाहीओ के साथ मेघमाया पाटण कि ओर निकल पडा.... रास्ते मे चलते

चलते वह क्रान्तिकारी अपने अछूत समाज का उध्धार करने की बात सोचकर राजा से कुछ मांग लिया जाय

यह तय कर लिया.... जब वो सिद्धराज के दरबार कौने मे खडा रहा तब उसे बताया गया कि सहस्त्रलिंग तालाब

मे श्राप की वजह से पानी नही आया है तो श्राप के निवारण के लिऐ तुम्हारी बलि देनी है.... यह सूनते ही मेघमाया

के पैरो से धरती खिसक गई ....लेकिन वह संभल गया.... क्रान्तिकारी मरते वक्त भी अपना स्वभाव नही छोडते...

उसे पता था कि ईन्कार करने की कोई अहमियत नही है... ईन्कार कीया तो वह जबरन मार डालेगे क्यो कि तब

अछूतो की ईच्छा पूछी नही जाती थी.... वो बोले महाराज मै तालाब के पानी के लिऐ मेरा बलि देने को तैयार हूं...

लेकिन मुजे कुछ सरपाव चाहिए....ब्राह्मणवाद के गुलाम होते भी न्याय के लिऐ जाना जाता ( हांलाकी तब

न्याय भी मनुस्मृति के कानून से ही होता था) सिद्धराज ने माया की सरपाव देने की मांग का स्विकार किया

और कहा... मांगो जो तुम मांगना चाहते हो वह मै दूंगा.... मौका मिलते ही हमारे ईस क्रान्तिकारी मेघमाया ने

कुछ मांगे अपने लिऐ नही किन्तु समाज के लिऐ मांगी

1 . मेरे अछूत समाज को पूरे राज्य मे सीम की जगह गांव मे बसाया जाय... उनके रहने के लिऐ वसाहत बनवाई

जाय

2. गले मे हांडी जो थूंकने के लिऐ लटकानी पडती थी वह निकाली जाय....

3. पिछवाडे बांधा जानेवाला झाडू निकल दीया जाय

4 . पहचान के लिऐ शर्ट की तीसरी बांय हटा दी जाय...

और उनका पूरे राज्य मे सख्ताई से पालन करवाया जाय

कहा जाता है कि मेघमाया ने शिक्षा का अधिकार, संपत्ति का अधिकार व शस्त्र धारण करने का भी अधिकार

ईसी मांग मे मांगा था किन्तु मनुस्मृति के विधानो के चलते ब्राह्मणो के दबाव के चलते यह तीन बात नही मानी

थी....

लेकिन जो मांग सिद्धराज ने मान ली उससे हमारे समाज को गांव मे रहने का अधिकार मिला....

गले मे हांडी, पिछवाडे झाडू व तीसरी बांय निकलते ही अछूतो को कुछ हद तक अश्पृश्यता से राहत मिली

और अछूतो मे तब से ईन्सान होने का अहेसास होने लगा.... और अछूतो की प्रगति का यह माईलस्टोन

बनकर आज उभर रहा है....

यह क्रान्तिकारी का बाद मे तालाब मे वध कर दीया गया.... पानी आया न आया यह तो बात की बात है

लेकिन पांच साल तक सूखा पडने से तालाब मे पानी नही आया था किन्तु मेघमाया के बलिदान से दूसरे

साल भारी बारीस हुई होगी तो तालाब पानी से भर गया होगा...

जो भी हो.....

सत्य तो यह है कि सामाजिक जनजागरण करते करते मेघमाया कट्टर ब्राह्मण त्रिभोवन पंड्या की नजरो

मे चड गया और त्रिभोवन पंड्या के षडयंत्र से उन महापुरूष की हत्या कर दी गई..... मतलब हरहंमेश की

तरहा हमारा क्रान्तिकारी महापुरूष ब्राह्मणवाद की भेंट चड गया....

मरकर भी ईस महापुरूष ने अछूत समाज का उध्धार किया और ईतिहास मे अमर हो गया.... बाद मे सदीयो

बाद ज्योतिराव फूले, शाहूजी, पेरियार, बाबासाहब के सामाजिक आन्दोलन की वजह से अैसे गुमनाम महान

क्रान्तिकारी महापुरूषो के ईतिहास की खोजबिन कि गई और सही ईतिहास हम जान पाये....

साथीयो. ....

आज भी हजारो महापुरूषो का सही ईतिहास ब्राह्मणो ने दबाकर खत्म करके कल्पित कहानिया हमारे सिर

पर मढ दी है हमे सामाजिक आन्दोलन के कार्यकर होने की फर्ज निभाकर ईतिहास को उजागर करने का काम

करके समाज को सच्चाई बताने का काम करना हैthanks

हीरा बोस (editer)

Sale!!! 
Meghwanshu Baba Ramdev book at Rs.80/
MRP 100/-
Offer 20%
Buy directly from my website - online buy here 
Or WhatsApp at 8824370228
#HEERA Bose
Share:

शनिवार, 27 मई 2017

बाबा साहेब अपने अंतिम दिनो मे रोते हुए पाये गये

बाबासाहब अपने अन्तिम दिनो मेँ अकेले रोते हुऐ पाये गये।

बाबासाहेब अम्बेडकर को जब काका कालेलकर कमीशन 1953 मेँ मिलने के लिए गए, तब कमीशन का सवाल था कि, #आपने सारी जिन्दगी पिछङे वर्ग के उत्थान के लिए लगा दी। आपकी राय मेँ उनके लिए क्या किया जाना चाहिए?

 बाबासाहब ने जवाब दिया कि, अगर पिछङे वर्ग का ऊत्थान करना है तो इनके अन्दर बडे लोग पैदा करो।

काका कालेलकर यह बात समझ नही पाये। उन्होंने फिर सवाल किया " बङे लोगों से आपका क्या तात्पर्य है?"

बाबासाहब ने जवाब दिया कि, *अगर किसी समाज मेँ 10 डॉक्टर, 20 वकील और 30 इंजीनियर पैदा हो जाऐ, तो उस समाज की तरफ कोई आँख उठाकर भी देख नही सकता।

"इस वाकये के ठीक 3 वर्ष बाद 18 मार्च 1956 मेँ आगरा के रामलीला मैदान मेँ बोलते हुऐ

बाबासाहेब ने कहा "मुझे पढे लिखे लोगों ने धोखा दिया। मै समझता था कि ये लोग पढ लिखकर अपने समाज का नेतृत्व करेंगे मगर मैँ देख रहा हुँ कि, मेरे आस-पास बाबुओं की भीड़ खड़ी हो रही हैँ, जो अपना ही पेट पालने मे लगी है। "यही नहीँ, बाबासाहब अपने अन्तिम दिनों मे अकेले रोते हुऐ पाये गये। जब वे सोने की कोशिश करते थे, तो उन्हें नही आती थी।

अत्यधिक परेशान रहते थे। परेशान होकर उनके स्टेनो नानकचंद रत्तु ने बाबासाहब से सवाल पूछा कि, आप इतना परेशान क्योँ रहते है?

उनका जवाब था, "नानकचंद, ये जो तुम दिल्ली देख रहो हो; इस अकेली दिल्ली मे 10,000 कर्मचारी, अधिकारी यह केवल अनुसूचित जाति के है; जो कुछ साल पहले शून्य थे।
मैंने अपनी जिन्दगी का सब कुछ दांव पर लगा दिया, अपने लोगों में पढे लिखे लोग पैदा करने के लिए। क्योंकि मै समझता था कि, मै अकेला पढकर इतना काम कर सकता हूँ, अगर हमारे हजारो लोग पढ लिख जायेगे तो इस समाज मे कितना बङा परिवर्तन आयेगा। मगर नानकचंद, मै जब पुरे देश की तरफ निगाह डालता हूँ तो मुझे कोई ऐसा नौजवान नजर नहीँ आता है, जो मेरे कारवाँ को आगे ले जा सके।

अगर आप कुछ करना चाहते हो तो उसके लिए आगे आना होगा।
सब चाहते है भगत सिंह पैदा हों किन्तु मेरे घर नही पडोसी के घर में।

लेकिन हम अपने घर में भगत सिंह को पैदा ही नही खुद भगत सिंह बनना भी चाहते हैं।

 
तो आय हमारे साथ।
युवाओं को जगाना है, भारत देश बचाना है!!!
हम राजनीती करने नही, राजनीती बदलने आ रहे है।

Share:

शनिवार, 3 सितंबर 2016

बाबा रामदेव जी

🙏🏻जय मेघ सा🙏🏻
🌹जय बाबा री🌹

बाबा रामदेव जी मेघवाल है
 सायर जी की वॅशावली
~~~~~~~~~~~~~~~~
जाँभा (जयपाल) से --चन्दहल
चन्दहल जी से = बिगहङ जी
बिगहङ जी से = भोजराज जी
भोजराज जी के दौ पुत्रो का नाम
(1) सायर जी (2) अङसी जी
--------------------------
सायर जी के पुत्र रामदेव जी थे
(ठाकुर अजमाल के आदेशानुसार सायर जी ने अपनै पुत्र रामदेव
को बिरम के पालणे मे सुलाया था - जिन्हे लोग "अजमल घर
अवतारी" के रुप मे जानते है )
------------------------
अङसी जी के दौ सन्तान थी ।
(1) पुत्री "डालीबाई"
(2) पुत्र "मुन्जा जी "
नोट( डाली ओर मुँजा जी के माता पिता का देहान्त हो जाने के
कारण - डाली ओर मुँजा जी को सायर जी ने "पुत्र 'पुत्री के रुप
मे स्वीकार कर गोद लिया था - ओर सायर जी ने
ही उनका पालन पोसन किया था )-
--------------------------
डालीबाई ने शायर जी के सानिध्य मे ही भक्ति साधना की थी ।
ओर रामदेव जी से पुर्व समाधि ले ली थी ।
जिसकी समाधि पर भाई मुँजाजी के परिवार वॅशज पीढीदर
पीढी सेवा करते आयै है ..जिनके टिकायत परिवार
की वॅशावली निम्नानुसार है
-------------------------
सायर जी के बाद
मुन्जा जी से मोडा जी
मोडा जी से। डुँगर जी
डुँगर जी से। बीजल जी
बीजल जी से माला जी
माला जी से खीमा जी
खीमा जी से धन्ना जी
धन्ना जी से नॅगा जी
नॅगा जी से माना जी
माना जी से नाथा जी
नाथा जी से केशरा जी
केशरा जी से भूरा जी
भुरा जी से भीखा जी
भीखा जी से हरजी
हरजी से मुकना जी
मुकना जी से पुनम जी
पुनम जी से उत्तमचन्द जी
वर्तमान मे उत्तमचन्द जी का परिवार टिकायत है
स्वामी जी ने स्पष्ट कहा था
कि - बाबा रामदेव मेघवाल थे ।
इसिलिये -
(1) "बाबे रा रिखिया" केवल मेघवाल है ।- तॅवरो को क्यो नही ?
(2) बाबा का जम्मा जागरण आज भी केवल मेघवालो से
ही जगाया जाता है - ओर उन्ही को जम्मे मे प्रथम भोजन
कराया जाता है जिसे "रिखिया जीमावणा" कहा जाता है ।
तॅवरो को क्यो नही ?
(3) मारवाङ मे प्राचीन ओखाणे प्रचलित है कि -"रामदेव जी नै
मिलिया सो मेघ ही मेघ (मेघो रा देव रामदेव)
क्यो कहा गया ?
तॅवरो के विषय मे ऐसै ओखाणे क्यो नही कहै गये ?
(5) बिना माता पिता के कोई पालणे मे कैसे प्रकट हो सकता है ?
-बाबा को जिस कृष्ण व राम का अवतार बताकर "अजमल घर
अवतारी" बताया जाता है - वो राम ओर कृष्ण भी जन्म लेकर
आये थे - प्रकट नही ह
Share:

मंगलवार, 26 जुलाई 2016

BABA SAHEB DR BHIMRAO AMBEDAKAR






जन्म
BABA SAHEB
DR BHIMRAO
AMBEDAKAR












14 अप्रैल 1891
महू, सेन्ट्रल प्रोविंस, ब्रिटिश भारत(वर्तमान मध्य प्रदेश में)
मृत्यु6 दिसम्बर 1956 (उम्र 65)
दिल्ली, भारत
राष्ट्रीयताभारतीय
अन्य नाममहान बोधिसत्व, बाबा साहेब
शिक्षाएम.ए., पी.एच.डी., डी. एससी., एलएल.डी., डी.लिट., बैरिस्टर एट लॉ
विद्यालयमुंबई विश्वविद्यालय
कोलंबिया विश्वविद्यालय
लंदन विश्वविद्यालय
लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स
संस्थासमता सैनिक दल, स्वतंत्र लेबर पार्टी,अनुसूचित जाति फेडरेशन, भारत की बौद्ध सोसायटी
उपाधिभारत के प्रथम कानून मंत्री, संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष

राजनीतिक पार्टीभारतीय रिपब्लिकन पार्टी
राजनीतिक आंदोलनअम्बेडकर का बौद्ध धर्म
धर्मबौद्ध धर्म
जीवनसाथीरामाबाई आंबेडकर (विवाह 1906) , सविता आंबेडकर (विवाह 1948)
पुरस्कारभारत रत्‍न (1990)
Share:

सोमवार, 20 जून 2016

कबीरदास

कबीरदास के जन्म के संबंध में अनेक किंवदन्तियाँ हैं। कबीर पन्थियों की मान्यता है कि कबीर का जन्म काशी में लहरतारा तालाब में उत्पन्न कमल के मनोहर पुष्प के ऊपर बालक के रूप में हुआ। कुछ लोगों का कहना है कि वे जन्म से मुसलमान थे और युवावस्था में स्वामी रामानंद के प्रभाव से उन्हें हिन्दू धर्म की बातें मालूम हुईं। एक दिन, एक पहर रात रहते ही कबीर पंचगंगा घाट की सीढ़ियों पर गिर पड़े। रामानन्द जी गंगा स्नान करने के लिये सीढ़ियाँ उतर रहे थे कि तभी उनका पैर कबीर के शरीर पर पड़ गया। उनके मुख से तत्काल `राम-राम' शब्द निकल पड़ा। उसी राम को कबीर ने दीक्षा-मन्त्र मान लिया और रामानन्द जी को अपना गुरु स्वीकार कर लिया। कबीर के ही शब्दों में-
हम कासी में प्रकट भये हैं,
रामानन्द चेताये।
कबीरदास
कबीरपंथियों में इनके जन्म के विषय में यह पद्य प्रसिद्ध है-
चौदह सौ पचपन साल गए, चन्द्रवार एक ठाठ ठए।
जेठ सुदी बरसायत को पूरनमासी तिथि प्रगट भए॥
घन गरजें दामिनि दमके बूँदे बरषें झर लाग गए।
लहर तलाब में कमल खिले तहँ कबीर भानु प्रगट भए॥[1]
मृत्यु
कबीर ने काशी के पास मगहर में देह त्याग दी। ऐसी मान्यता है कि मृत्यु के बाद उनके शव को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया था। हिन्दू कहते थे कि उनका अंतिम संस्कार हिन्दू रीति से होना चाहिए और मुस्लिम कहते थे कि मुस्लिम रीति से। इसी विवाद के चलते जब उनके शव पर से चादर हट गई, तब लोगों ने वहाँ फूलों का ढेर पड़ा देखा। बाद में वहाँ से आधे फूल हिन्दुओं ने ले लिए और आधे मुसलमानों ने। मुसलमानों ने मुस्लिम रीति से और हिंदुओं ने हिंदू रीति से उन फूलों का अंतिम संस्कार किया। मगहर में कबीर की समाधि है। जन्म की भाँति इनकी मृत्यु तिथि एवं घटना को लेकर भी मतभेद हैं किन्तु अधिकतर विद्वान उनकी मृत्यु संवत 1575 विक्रमी (सन 1518 ई.) मानते हैं, लेकिन बाद के कुछ इतिहासकार उनकी मृत्यु 1448 को मानते हैं।[2]
परंतु किवदंतियों के माध्यम से पाखंडवादियो वव मनुवादियो ने उन्हें ही उसमें बांध दिया, जिससे वो अपने जीवन भर छुटकारा दिलाते रहे। जागो भाइयो और आज उनके जन्म दिन पर उनके मार्ग पर चलने की द्रण प्रतिज्ञा लो
©कबीर की अन्धविश्वास, पाखंड, भेदभाव, जातिप्रथा, हिन्दू, मुस्लिम पर करारी चोट !!©
” जो तूं ब्रह्मण , ब्राह्मणी का जाया !
आन बाट काहे नहीं आया !! ”
– कबीर
(अर्थ- अपने आप को ब्राह्मण होने पर गर्व करने वाले ज़रा यह तो बताओ की जो तुम अपने आप की महान कहते तो फिर तुम किसी अन्य रास्ते से जाँ तरीके से पैदा क्यों नहीं हुआ ? जिस रास्ते से हम सब पैदा हुए हैं, तुम भी उसी रास्ते से ही क्यों पैदा हुए है ?)
कोई आज यही बात बोलने की ‘हिम्मंत’ भी नहीं करता ओर कबीर सदियों पहले कह गए ।। हमे गर्व हैं की हम उस महान संत के अनुयाई हैं । ऐसे महान क्रांतिकारी संत को कोटी कोटि नमन !!!
“लाडू लावन लापसी ,पूजा चढ़े अपार
पूजी पुजारी ले गया,मूरत के मुह छार !!”
– कबीर
(अर्थ – आप जो भगवान् के नाम पर मंदिरों में दूध, दही, मख्कन, घी, तेल, सोना, चाँदी, हीरे, मोती, कपडे, वेज़- नॉनवेज़ , दारू-शारू, भाँग, मेकअप सामान, चिल्लर, चेक, कॅश इत्यादि माल जो चढाते हो, क्या वह बरोबर आपके भगवान् तक जा रहा है क्या ?? आपका यह माल कितना % भगवान् तक जाता है ? ओर कितना % बीच में ही गोल हो रहा है ? या फिर आपके भगवान तक आपके चड़ाए गए माल का कुछ भी नही पहुँचता ! अगर कुछ भी नही पहुँच रहा तो फिर घोटाला कहा हो रहा है ? ओर घोटाला कौन कर रहा है ? सदियों पहले दुनिया के इस सबसे बड़े घोटाले पर कबीर की नज़र पड़ी | कबीर ने बताया आप यह सारा माल ब्राह्मण पुजारी ले जाता है ,और भगवान् को कुछ नहीं मिलता, इसलिए मंदिरों में ब्राह्मणों को दान करना बंद करो )
‪#‎अन्धविश्वास_पर_कबीर_की_चोट‬ !!
‪#‎हिन्दुओ_पर‬
”पाथर पूजे हरी मिले,
तो मै पूजू पहाड़ !
घर की चक्की कोई न पूजे,
जाको पीस खाए संसार !!”
– कबीर
”मुंड मुड़या हरि मिलें ,सब कोई लेई मुड़ाय |
बार -बार के मुड़ते ,भेंड़ा न बैकुण्ठ जाय ||”
– कबीर
”माटी का एक नाग बनाके,
पुजे लोग लुगाया !
जिंदा नाग जब घर मे निकले,
ले लाठी धमकाया !!”
– कबीर
” जिंदा बाप कोई न पुजे, मरे बाद पुजवाये !
मुठ्ठी भर चावल लेके, कौवे को बाप बनाय !!
– कबीर
”हमने देखा एक अजूबा ,मुर्दा रोटी खाए ,
समझाने से समझत नहीं ,लात पड़े चिल्लाये !!”
– कबीर
‪#‎मुसलमानों_पर‬
”कांकर पाथर जोरि के ,मस्जिद लई चुनाय |
ता उपर मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय ||”
– कबीर
‪#‎हिन्दू_मुस्लिम_दोनों_पर‬
”हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना,
आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना।”
– कबीर
(अर्थ : कबीर कहते हैं कि हिन्दू राम के भक्त हैं और तुर्क (मुस्लिम) को रहमान प्यारा है. इसी बात पर दोनों लड़-लड़ कर मौत के मुंह में जा पहुंचे, तब भी दोनों में से कोई सच को न जान पाया।)
‪#‎हिन्दुओ_की_जाति_पर_कबीर_की_चोट‬
”जाति ना पूछो साधू की, पूछ लीजिये ज्ञान !
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान !!
– कबीर
”काहे को कीजै पांडे छूत विचार।
छूत ही ते उपजा सब संसार ।।
हमरे कैसे लोहू तुम्हारे कैसे दूध।
तुम कैसे बाह्मन पांडे, हम कैसे सूद।।”
– कबीर
”कबीरा कुंआ एक हैं,
पानी भरैं अनेक ।
बर्तन में ही भेद है,
पानी सबमें एक ॥”
– कबीर
”एक बून्द ,एकै मल मुतर,
एक चाम ,एक गुदा ।
एक जोती से सब उतपना,
कौन बामन कौन शूद ”
– कबीर
‪#‎कबीर_की_सबको_सीख‬ ‪#‎बाकि_समझ_अपनी_अपनी‬
”जैसे तिल में तेल है,
ज्यों चकमक में आग I
तेरा साईं तुझमें है ,
तू जाग सके तो जाग II ”
– कबीर
मोको कहाँ ढूंढे रे बन्दे ,
मैं तो तेरे पास में।
ना मैं तीरथ में, ना मैं मुरत में,
ना एकांत निवास में ।
ना मंदिर में , ना मस्जिद में,
ना काबे , ना कैलाश में।।
ना मैं जप में, ना मैं तप में,
ना बरत ना उपवास में ।।।
ना मैं क्रिया करम में,
ना मैं जोग सन्यास में।।
खोजी हो तो तुरंत मिल जाऊ,
इक पल की तलाश में ।।
कहत कबीर सुनो भई साधू,
मैं तो तेरे पास में बन्दे…
मैं तो तेरे पास में…..
अंत में
ईश्वर, नारायण, हरी, राम, कृष्ण, घनश्याम।
ब्रम्हां, विष्णु, महेश, सब माया कल्पित नाम।।
अजामेध गोमेध जग, अश्वमेध नरमेध।
कहै कबीर अधर्म को, धर्म बतावै वेद।।
अर्थात- बकरे, गाय, घोड़े और यहाँ तक की मनुष्यो का यज्ञ हवन के नाम पर वध करने जैसे हिंसक एव अधर्म के कार्य को भी वेद धर्म बताते हैं।
Share:

गुरुवार, 2 जून 2016

झलंकारी बाई

झलंकारी बाई

पूरा नाम – झलकारी बाई
जन्म – 22 नवम्बर 1830
जन्मस्थान – भोजला ग्राम
पिता – सदोबा सिंह
माता – जमुना देवी
विवाह – पूरण सिंह
झलकारी बाई का इतिहास / Virangana Jhalkari Bai History In Hindi
झलकारी बाई एक भारतीय महिला सैनिक थी जिसने 1857 के समय झाँसी के युद्ध में भारतीय बगावत के समय महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की महिलाओ की सेना में वह महिला सैनिक थी. उनका जन्म एक गरीब कोरी परीवार में हुआ था, वे एक साधारण सैनिक की तरह रानी लक्ष्मीबाई की सेना में शामिल हुई थी. लेकिन बाद में वह रानी लक्ष्मीबाई की विशेष सलाहकार बनी और महत्वपूर्ण निर्णयों में भी भाग लेने लगी. बगावत के समय, झाँसी के किले पर युद्ध के समय वह अपने आप को झाँसी की रानी कहते हुए लड़ी ताकि रानी लक्ष्मीबाई सुरक्षित रूप से आगे बढ़ सके.
बुन्देलखण्ड की याद में सालो तक झलकारीबाई की महानता को याद किया जाता है. उनका जीवन और विशेष रूप से ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ उनके लड़ने की कला को बुन्देलखण्ड ही नही बल्कि पूरा भारत हमेशा याद रखेगा. दलित के तौर पर उनकी महानता ने उत्तरी भारत में दलितों के जीवन पर काफी प्रभाव डाला. बाद में कुछ समय बाद ब्रिटिशो द्वारा झलकारीबाई को फाँसी दे दी गयी थी.
उनके नाम को दलितों का सम्मान और गर्व बताया जाता है. इसे देखते हुए उनके जीवन पर काफी शोध किये गये और उनके जीवन के बारे में कुछ रोचक तथ्य भी मिले. लेकिन अधिकतर समय झलकारीबाई को बहुजनो की इतिहासिक हीरोइन कहा गया है.
झलकारीबाई की जीवनी / Biography Of Jhalkari Bai In Hindi
झलकारीबाई सदोबा सिंह और जमुना देवी की बेटी थी. उनका जन्म 22 नवम्बर 1830 को झाँसी के नजदीक भोजला ग्राम में हुआ था. उनकी माता के मृत्यु के बाद, जब वह किशोर थी, तब उनके पिता ने उन्हें एक बेटे की तरह बड़ा किया. बचपन से ही वह घुड़सवारी और हथियार चलाने में माहिर थी. लेकिन उस समय की सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए, झलकारीबाई प्रारंभिक शिक्षा नही ले सकी. लेकिन एक योद्धा की तरह झलकारीबाई ने काफी प्रशिक्षण प्राप्त किया था.
झलकारीबाई को रानी लक्ष्मीबाई के समान माना जाता है. उन्होंने एक तोपची सैनिक पूरण सिंह से विवाह किया था, जो रानी लक्ष्मीबाई के ही तोपखाने की रखवाली किया करते थे. पुराण सिंह ने ही झलकारीबाई को रानी लक्ष्मीबाई से मिलवाया था. बाद में झलकारी बाई भी रानी लक्ष्मीबाई की सेना में शामिल हो गयी थी. सेना में शामिल होने के बाद झलकारीबाई ने युद्ध से सम्बंधित अभ्यास ग्रहण किया और एक कुशल सैनिक बनी.
1857 के विद्रोह के समय, जनरल रोज ने अपनी विशाल सेना के साथ 23 मार्च 1858 को झाँसी पर आक्रमण किया. रानी ने वीरतापूर्वक अपने 5000 के सैन्य दल से उस विशाल सेना का सामना किया. रानी कालपी में पेशवा द्वारा सहायता की प्रतीक्षा कर रही थी लेकिन उन्हें कोई सहायता नही मिल सकी क्योकि तात्या टोपे जनरल रोज से पराजित हुए थे. जल्द ही अंग्रेज फ़ौज झाँसी में घुस गयी थी और रानी अपनी झाँसी को बचाने के लिए जी जान से लढ रही थी. तभी झलकारीबाई ने रानी लक्ष्मीबाई के प्राणों को बचाने के लिये खुद को रानी बताते हुए लड़ने का फैसला किया, इस तरह झलकारीबाई ने पूरी अंग्रेजी सेना को अपनी तरफ आकर्षित कर रखा था ताकि दूसरी तरफ से रानी लक्ष्मीबाई सुरक्षित बाहर निकाल सके. इस तरह झलकारीबाई खुद को रानी बताते हुए लडती रही और जनरल रोज की सेना भी झलकारीबाई को ही रानी समझकर उनपर प्रहार करने लगी थी. लेकिन दिन के अंत में उन्हें पता चल गया था की वह रानी नही है.
झलकारीबाई की प्रसिद्धि :
1951 में बी.एल. वर्मा द्वारा रचित उपन्यास झाँसी की रानी में उनका उल्लेख किया गया है, वर्मा ने अपने उपन्यास में झलकारीबाई को विशेष स्थान दिया है. उन्होंने अपने उपन्यास में झलकारीबाई को कोरियन और रानी लक्ष्मीबाई के सैन्य दल की साधारण महिला सैनिक बताया है. एक और उपन्यास में हमें झलकारीबाई का उल्लेख दिखाई देता है, जो इसी वर्ष राम चन्द्र हेरन द्वारा लिखा गया था, उस उपन्यास का नाम माटी था. हेरन ने झलकारीबाई को “उदात्त और वीर शहीद” कहा है. झलकारीबाई का पहला आत्मचरित्र 1964 में भवानी शंकर विशारद द्वारा लिखा गया था, भवानी शंकर ने उनका आत्मचरित्र का लेखन वर्मा के उपन्यास और झलकारी बाई के जीवन पर आधारित शोध को देखते हुए किया था.
बाद में कुछ समय बाद महान जानकारो ने झलकारीबाई की तुलना रानी लक्ष्मीबाई के जीवन चरित्र से भी की.
झलकारीबाई की महानता :
कुछ ही वर्षो में भारत में झलकारीबाई की छवि में काफी प्रख्याति आई है. झलकारीबाई की कहानी को सामाजिक और राजनैतिक महत्ता दी गयी. और लोगो में भी उनकी कहानी सुनाई गयी. बहोत से संस्थाओ द्वारा झलकारीबाई के मृत्यु दिन को शहीद दिवस के रूप में भी मनाया जाता है.
झलकारीबाई की महानता को देखते हुए ही उन्हें सम्मानित करने के उद्देश से पृथक बुन्देलखण्ड राज्य बनाने की मांग की गयी थी. भारत सरकार ने झलकारीबाई के नाम का पोस्ट और टेलीग्राम स्टेम्प भी जारी किया है.
भारतीय पुरातात्विक सर्वे ने अपने पंच महल के म्यूजियम में, झाँसी के किले में झलकारीबाई का भी उल्लेख किया है.
भारत की सम्पूर्ण आज़ादी के सपने को पूरा करने के लिए प्राणों का बलिदान करने वाली वीरांगना झलकारीबाई का नाम अब इतिहास के काले पन्नो से बाहर आकार पूर्ण चाँद के समान चारो और अपनी आभा बिखेरने लगा है.
झलकारी बाई की बहादुरी को हम निम्न पंक्तियों में देख सकते है-
“जा कर रण में ललकारी थी,
वह तो झाँसी की झलकारी थी,
गोरो से लड़ना सिखा गयी,
है इतिहास में झलक रही,
वह भारत की ही नारी थी!!”
ज्ञानीपंडित.कॉम से साभार
Share:

गुरुवार, 12 मई 2016

राजाराम की बलि दी गई जोधपुर दुर्ग की नीव मे

यह पुस्तक खरीदने के लिये सम्पर्क करे 8824370228, 8107640729, heeraram.bose@gmail.com



जोधपुर। मेहरानगढ़ के नाम से प्रसिद्ध दुर्ग के साथ अजीबोगरीब कहानी जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि इस दुर्ग की नींव तभी रखी गई जब राठौड़ वंश के समय एक व्यक्ति राजाराम मेघवाल ने खुद को नींव के साथ चुनवाया। 12 मई 2015 को जोधपुर शहर की स्थापना का 556 वर्ष पूरा हो जाएगा। इसी स्थापना दिवस के मद्देनजर मेहरानगढ़ दुर्ग की कहानी पेश कर रहा है।
पंडितों-तांत्रिकों ने नरबलि को बताया जरूरी
मारवाड़ की राजधानी उन दिनों मंडोर हुआ करती थी। राठौड़ वंश के तत्कालीन शासक राव जोधा ने भविष्य को ध्यान में रखते हुए एक नया शहर बसाने की सोची। इसके लिए वर्तमान जोधपुर शहर के स्थान का चयन कर चिड़ियानाथ टूंक नाम की पहाड़ी की चोटी पर नया दुर्ग बनाने का निर्णय किया गया।
कहा जाता है कि राव जोधा ने नए दुर्ग का निर्माण शुरू करने से पूर्व पंडितों और तांत्रिकों से परामर्श किया। उन सभी की राय थी कि किसी भी बड़े कार्य की सफलता के लिए आवश्यक है कि किसी नर की बलि दी जाए। इस कारण किले की नींव में यदि किसी जीवित व्यक्ति को पत्थरों के साथ चुनवा दिया जाए तो राठौड़ राजवंश को कभी पराभव के दिन नहीं देखने को मिलेंगे। इस राय से सहमत हो राव जोधा ने मारवाड़ में मुनादी करवा दी। उस दौर में राजा की ओर से उनके हरकारे गांव-गांव जाकर ढोल-नगाड़ों को बजा राजा का फरमान सुनाया करते थे।


राजा का फरमान - चाहिए आत्मबलिदानी


राजा की आज्ञा की पालना में हरकारों ने गांव-गांव जाकर घोषणा की कि राव जोधा मारवाड़ की नई राजधानी का निर्माण करने जा रहे है। इसके लिए किसी ऐसे स्वामी भक्त वीर पुरुष की आवश्यकता है जो दुर्ग की नींव में स्वयं को जीवित गाड़े जाने के लिए अपनी मर्जी से पेश कर सके। ऐसे साहस के धनी व्यक्ति को ढेरों पुरस्कार के साथ ही उसके परिजनों और वंशजों को जोधपुर में रहने व खेतीबाड़ी के लिए पर्याप्त जमीन दी जाएगी। ऐसा वीर पुरुष 12 मई को सुबह चिड़ियानाथ की टूंक की पहाड़ी पर अपने आत्मबलिदान को पहुंच जाए।


शुरुआत में कोई नहीं आया आगे
राव जोधा ने तो मुनादी करवा दी, लेकिन जीते जी स्वयं के आत्मबलिदान को कौन तैयार होता। ऐसे में जितने मुंह उतनी बाते, लेकिन सामंतशाही के खिलाफ मुंह खोलने की हिम्मत किसी में नहीं थी। कई दिन निकल गए लेकिन आत्मबलिदान को कोई सामने नहीं आया। आखिरकार 12 मई का दिन आ गया। चिडिय़ानाथ की टूंक पहाड़ी पर नींव के मुहूर्त की तैयारियां शुरू हो गई। राजा के साथ ही पंडित व जागीरदार सहित बड़ी संख्या में पूजा की तैयारियों में जुट गए। सभी को आत्मबलिदानी का इंतजार था, लेकिन कोई आगे नहीं आया।


आगे आया राजिया


निराशा में डूबे राव जोधा ने घोषणा कर दी कि मुहूर्त का समय नहीं चूकना चाहिए। इसलिए नींव भरने का कार्य शुरू किया जाए। नींव भरने का कार्य शुरू होता उससे पूर्व शांत वातावरण में एक आवाज गूंजी- ठहरो। सभी उस आवाज की तरफ देखने लगे। एक व्यक्ति आगे अाया और बोला मैं नींव में स्वयं की आहुति देने को तैयार हूं। इस पर राव जोधा ने उसका नाम पूछा तो उसने बताया राजिया भाम्बी। राव जोधा ने एक बार फिर उससे पूछा और उसने सहमति जताते हुए कहा कि इस कार्य के लिए देय सारी सुविधा अभी दी जाए। इस पर उसे जमीन का पट्टा व दस हजार रुपए नगद प्रदान किए गए। राव जोधा के आदेश पर जमीन का पट्टा उसकी पत्नी व पुत्र के नाम कर दिया गया।


...और जा खड़ा हुआ नींव में


अगले ही पल राजाराम कूद कर नींव भरने के स्थान पर पहुंच गया। मुहूर्त देख पंडितों ने मंत्र पढ़ने शुरू किए और कारीगरों ने राजाराम के चारों तरफ पत्थरों की चुनाई शुरू की। राजिया मूकदर्शक बना सभी को निहारता रहा। देखते ही देखते राजिया को पत्थरों में चुन नींव का एक हिस्सा बना दिया। बाद में राजाराम के चुने जाने के स्थान के ठीक ऊपर पंडितों की सलाह से दुर्ग का खजाना बनाया गया। राजिया के तन पर खड़ा यह दुर्ग साढ़े पांच सौ बरस से कितने ही झंझावतों का साक्षी बन आज भी खड़ा है। यह दीगर बात है कि जिस राठौड़ वंश के राज्य के लिए राजिया ने आत्मबलिदान दिया वह अब अक्षुण्ण नहीं रह पाया। देश की आजादी के बाद लोकतंत्र में अब राजशाही नहीं रही, लेकिन राव जोधा का बनवाया यह दुर्ग अभी भी सीना ताने गर्व के साथ राजिया के तन पर खड़ा है।
Share:

बुधवार, 11 मई 2016

दलित क्रांतिकारी वीर महानायक मतादीन भंगी: क्रांति 1857

Matadin Bhangi ( दलित क्रांतिकारी वीर महानायक मतादीन भंगी)

जब हम आजादी का इतिहास पढते हैं तब, सन 1857  का सैनिक विद्रोह याद आता है।  और जब यह विद्रोह याद 
आता है तब, मंगल पांडे अनायास अपने ब्रिटिश सार्जेंट की छाती पर बन्दूक ताने आपके जेहन में कूद पड़ता है। 
मगर,यह तस्वीर का एक पहलू है।

सन 1857 के सैनिक विद्रोह का 
महानायक मातादीन भंगी  
तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि इतिहास को लिखने की जिसकी ठेकेदारी थी, चाहे ब्राह्मण हो या ठाकुर; था ऊँची जात। अब यह तो आपने देख ही लिया है कि वशिष्ठ हो या विश्वामित्र; गुरु (द्रोणाचार्य) की कुर्सी रहती उसके पास ही है !

खैर, हम सन 1857  के सैनिक विद्रोह पर आते हैं। इस सैनिक विद्रोह की कथा पढ्ते समय ब्राह्मणोँ की  छाति फूल जाती है। यह विद्रोह हिंदुओं की आस्था से जुड़ा है। और यह तो आप  जानते ही  हैं कि आस्था के सामने सारा साइंस और तर्क बौने हो जाते हैं।

हिंदुओं की मान्यता है कि ब्राह्मण श्रेष्ठ है। ब्राह्मण, श्रेष्ठ इसलिए है कि वह गाय का मांस नहीं खाता। गाय का मांस खाने की बात 
दूर, वह उसे मुंह क्या हाथ भी नहीं लगाता ?

ब्रिटिश आर्मी में मंगल पांडे नाम का एक ब्राह्मण था।  ब्राह्मण एक ऐसा जीव है कि सेना  में भर्ती हो कर युद्ध कर सकता है, राशन- 
किराने की दुकान पर बैठ कर पंसारी बन सकता है।   और तो और शहर के बीचों-बीच बाजार में फूट-वियर की दुकान खोलकर  
वह जूते -चप्पल बेच सकता है।  भाई , कानून-कायदे उसने खुद  बनाया है ! वह सब कर सकता है ?

हुआ यह कि एक दिन मंगल पांडे अपने साथी सिपाही के हाथ से पानी का लोटा लेने से इसलिए मना कर देता है कि उसे देने वाला
 भंगी जात का था।   बात बढ़ने पर तैश में वह सिपाही कहता है कि गाय और सुअर की चर्बी से बनी  बन्दूक की गोली का खोका तो
 मुंह से तोड़ते तुम्हारा धर्म भ्रष्ट नहीं होता मगर ,  अपने सह-धर्मी से छुए लोटे का पानी तुम्हें भृष्ट करता है ?  बात कडुवी मगर, सच थी।

गाय और सूअर की चर्बी की सच्चाई जान मंगल पांडे आग बबूला हो अपने प्लाटून कमांडर पर हमला कर देता है। बैरक में अफरा-तफरी 
देख जब सीनियर अधिकारी आगे बढ़ता है तो मंगल पांडे उल्टे उस पर ही बन्दूक तान देता है। भारतीय सैनिक विद्रोह पर उतारू हो 
जाते हैं।  देखते ही देखते यह विद्रोह अन्य कई बैरकों में फ़ैल जाता है।

ब्रिटीश सैनिक छावनियों में भारतीय सैनिकों का यह विद्रोह कोई  छोटी-मोटी घटना नहीं थी। मगर,  क्या इस सैनिक विद्रोह का हीरो
 मंगल पांडे था ?  भंगी जाति के उस सिपाही की,  जिसने  मंगल पांडे को अपने सह-धर्मी से पशु जैसा व्यवहार करने को ललकारा 
था, क्या कोई भूमिका नहीं थी ?  दोस्तों ,  वह भंगी जाति का सिपाही और कोई नहीं, दलित क्रांतिकारी वीर महानायक मातादीन भंगी था।
Share:

मंगलवार, 3 मई 2016

संत कबीर

कबीर हिंदी साहित्य के महिमामण्डित व्यक्तित्व हैं। कबीर के जन्म के संबंध में अनेक किंवदन्तियाँ हैं। कुछ लोगों के अनुसार वे रामानन्द स्वामी के आशीर्वाद से काशी की एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से पैदा हुए थे, जिसको भूल से रामानंद जी ने पुत्रवती होने का आशीर्वाद दे दिया था। ब्राह्मणी उस नवजात शिशु को लहरतारा ताल के पास फेंक आयी।
कबीर के माता- पिता के विषय में एक राय निश्चित नहीं है कि कबीर "नीमा' और "नीरु' की वास्तविक संतान थे या नीमा और नीरु ने केवल इनका पालन- पोषण ही किया था।  कहा जाता है कि नीरु जुलाहे को यह बच्चा लहरतारा ताल पर पड़ा पाया, जिसे वह अपने घर ले आया और उसका पालन-पोषण किया। बाद में यही बालक कबीर कहलाया।
कबीर ने स्वयं को जुलाहे के रुप में प्रस्तुत किया है -
"जाति जुलाहा नाम कबीरा
बनि बनि फिरो उदासी।'


कबीर पन्थियों की मान्यता है कि कबीर की उत्पत्ति काशी में लहरतारा तालाब में उत्पन्न कमल के मनोहर पुष्प के ऊपर बालक के रूप में हुई। ऐसा भी कहा जाता है कि कबीर जन्म से मुसलमान थे और युवावस्था में स्वामी रामानन्द के प्रभाव से उन्हें हिंदू धर्म का ज्ञान हुआ।  एक दिन कबीर पञ्चगंगा घाट की सीढ़ियों पर गिर पड़े थे, रामानन्द ज उसी समय गंगास्नान करने के लिये सीढ़ियाँ उतर रहे थे कि उनका पैर कबीर के शरीर पर पड़ गया। उनके मुख से तत्काल `राम-राम' शब्द निकल पड़ा। 
उसी राम को कबीर ने दीक्षा-मन्त्र मान लिया और रामानन्द जी को अपना गुरु स्वीकार कर लिया। कबीर के ही शब्दों में- `हम कासी में प्रकट भये हैं, रामानन्द चेताये'। अन्य जनश्रुतियों से ज्ञात होता है कि कबीर ने हिंदु-मुसलमान का भेद मिटा कर हिंदू-भक्तों तथा मुसलमान फक़ीरों का सत्संग किया और दोनों की अच्छी बातों को आत्मसात कर लिया।
जनश्रुति के अनुसार कबीर के एक पुत्र कमल तथा पुत्री कमाली थी। इतने लोगों की परवरिश करने के लिये उन्हें अपने करघे पर काफी काम करना पड़ता था। साधु संतों का तो घर में जमावड़ा रहता ही था। 

कबीर को कबीर पंथ में, बाल- ब्रह्मचारी और विराणी माना जाता है। इस पंथ के अनुसार कामात्य उसका शिष्य था और कमाली तथा लोई उनकी शिष्या। लोई शब्द का प्रयोग कबीर ने एक जगह कंबल के रुप में भी किया है। वस्तुतः कबीर की पत्नी और संतान दोनों थे। एक जगह लोई को पुकार कर कबीर कहते हैं :- 
"कहत कबीर सुनहु रे लोई।
हरि बिन राखन हार न कोई।।'
कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे-
`मसि कागद छूवो नहीं, कलम गही नहिं हाथ।' 

उन्होंने स्वयं ग्रंथ नहीं लिखे, मुँह से भाखे और उनके शिष्यों ने उसे लिख लिया। आप के समस्त विचारों में रामनाम की महिमा प्रतिध्वनित होती है। वे एक ही ईश्वर को मानते थे और कर्मकाण्ड के घोर विरोधी थे। अवतार, मूर्त्ति, रोज़ा, ईद, मसजिद, मंदिर आदि को वे नहीं मानते थे।

कबीर के नाम से मिले ग्रंथों की संख्या भिन्न-भिन्न लेखों के अनुसार भिन्न-भिन्न है। एच.एच. विल्सन के अनुसार कबीर के नाम पर आठ ग्रंथ हैं। विशप जी.एच. वेस्टकॉट ने कबीर के ८४ ग्रंथों की सूची प्रस्तुत की तो रामदास गौड ने `हिंदुत्व' में ७१ पुस्तकें गिनायी हैं।
कबीर की वाणी का संग्रह `बीजक' के नाम से प्रसिद्ध है। इसके तीन भाग हैं- रमैनी, सबद और सारवी यह पंजाबी, राजस्थानी, खड़ी बोली, अवधी, पूरबी, व्रजभाषा आदि कई भाषाओं की खिचड़ी है।

कबीर परमात्मा को मित्र, माता, पिता और पति के रूप में देखते हैं। यही तो मनुष्य के सर्वाधिक निकट रहते हैं। वे कभी कहते हैं-
`हरिमोर पिउ, मैं राम की बहुरिया' तो कभी कहते हैं, `हरि जननी मैं बालक तोरा'
उस समय हिंदु जनता पर मुस्लिम आतंक का कहर छाया हुआ था। कबीर ने अपने पंथ को इस ढंग से सुनियोजित किया जिससे मुस्लिम मत की ओर झुकी हुई जनता सहज ही इनकी अनुयायी हो गयी। उन्होंने अपनी भाषा सरल और सुबोध रखी ताकि वह आम आदमी तक पहुँच सके। इससे दोनों सम्प्रदायों के परस्पर मिलन में सुविधा हुई। इनके पंथ मुसलमान-संस्कृति और गोभक्षण के विरोधी थे।

कबीर को शांतिमय जीवन प्रिय था और वे अहिंसा, सत्य, सदाचार आदि गुणों के प्रशंसक थे। अपनी सरलता, साधु स्वभाव तथा संत प्रवृत्ति के कारण आज विदेशों में भी उनका समादर हो रहा है।
कबीर का पूरा जीवन काशी में ही गुजरा, लेकिन वह मरने के समय मगहर चले गए थे।  वह न चाहकर भी, मगहर गए थे। वृद्धावस्था में यश और कीर्त्ति की मार ने उन्हें बहुत कष्ट दिया। उसी हालत में उन्होंने बनारस छोड़ा और आत्मनिरीक्षण तथा आत्मपरीक्षण करने के लिये देश के विभिन्न भागों की यात्राएँ कीं। कबीर मगहर जाकर दु:खी थे:
"अबकहु राम कवन गति मोरी।
तजीले बनारस मति भई मोरी।।''
कहा जाता है कि कबीर के शत्रुओं ने उनको मगहर जाने के लिए मजबूर किया था। वे चाहते थे कि कबीर की मुक्ति न हो पाए, परंतु कबीर तो काशी मरन से नहीं, राम की भक्ति से मुक्ति पाना चाहते थे: "जौ काशी तन तजै कबीरा
तो रामै कौन निहोटा।''
अपने यात्रा क्रम में ही वे कालिंजर जिले के पिथौराबाद शहर में पहुँचे। वहाँ रामकृष्ण का छोटा सा मन्दिर था। वहाँ के संत भगवान गोस्वामी जिज्ञासु साधक थे किंतु उनके तर्कों का अभी तक पूरी तरह समाधान नहीं हुआ था। संत कबीर से उनका विचार-विनिमय हुआ। कबीर की एक साखी ने उन के मन पर गहरा असर किया-
`बन ते भागा बिहरे पड़ा, करहा अपनी बान।
करहा बेदन कासों कहे, को करहा को जान।।'
वन से भाग कर बहेलिये के द्वारा खोये हुए गड्ढे में गिरा हुआ हाथी अपनी व्यथा किस से कहे ?
सारांश यह कि धर्म की जिज्ञासा सें प्रेरित हो कर भगवान गोसाई अपना घर छोड़ कर बाहर तो निकल आये और हरिव्यासी सम्प्रदाय के गड्ढे में गिर कर अकेले निर्वासित हो कर ऐसी स्थिति में पड़ चुके हैं।
कबीर आडम्बरों के विरोधी थे। मूर्त्ति पूजा को लक्ष्य करती उनकी एक साखी है -
पाहन पूजे हरि मिलैं, तो मैं पूजौंपहार।
था ते तो चाकी भली, जासे पीसी खाय संसार।।
११९ वर्ष की अवस्था में मगहर में कबीर का देहांत हो गया। कबीरदास जी का व्यक्तित्व संत कवियों में अद्वितीय है। हिन्दी साहित्य के १२०० वर्षों के इतिहास में गोस्वामी तुलसीदास जी के अतिरिक्त इतना प्रतिभाशाली व्यक्तित्व किसी कवि का नहीं है।
Share:

BAHUJAN TIME

BAHUJAN TIME
BABA SAHEB DR BHIMRAO AMBEDAKAR

Categories